उत्तराखंड में आपदा के बाद सरकारी मदद: धामी सरकार की जुमलेबाजी की जमीनी हकीकत
उत्तराखंड में आपदा के बाद सरकारी मदद: धामी सरकार की जुमलेबाजी की जमीनी हकीकत
उत्तराखंड, हिमालय की गोद में बसी देवभूमि, हर साल मानसून के दौरान बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने जैसी आपदाओं का शिकार बनती है। 2025 का मानसून भी अपवाद नहीं रहा। अगस्त से सितंबर तक चले भारी वर्षा ने राज्य को हिला दिया। 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली गांव में बादल फटने से फ्लैश फ्लड आया, जिसमें कम से कम 5 लोग मारे गए और 50 से अधिक लापता हो गए। सितंबर में चमोली के नंदानगर, पौड़ी के सैंजी, नैनीताल के मालदेवता और देहरादून के सहस्रधारा जैसे इलाकों में भूस्खलन और बाढ़ ने 20 से अधिक जानें लीं, सैकड़ों घर तबाह किए और चार धाम यात्रा को प्रभावित किया। कुल मिलाकर, 2025 की आपदाओं में 50 से अधिक मौतें, सैकड़ों लापता और हजारों प्रभावित हुए। केंद्र और राज्य सरकार ने तुरंत राहत का ऐलान किया, लेकिन सवाल यह है कि सरकारी मदद कितनी दूर पहुंची? पुष्कर सिंह धामी सरकार की ‘वार फुटिंग’ पर की गई घोषणाएं जमीनी स्तर पर कितनी कारगर साबित हुईं? यह लेख आपदा के बाद की सरकारी प्रतिक्रिया, उसके दावों और जमीनी हकीकत को विस्तार से समझाता है।
आपदा की शुरुआत: 2025 का मानसूनी कहर
2025 का मानसून उत्तराखंड के लिए अभिशाप साबित हुआ। 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली-हर्षिल क्षेत्र में बादल फटने से खीर गंगा नदी उफान पर आ गई। मलबा और पानी की लहर ने गांव के बाजार, घरों और सेना कैंप को बहा लिया। शुरुआती रिपोर्ट्स में 4 मौतें और 100 से अधिक लापता बताए गए। सितंबर में चमोली के नंदानगर में भूस्खलन से 14 लोग दब गए, जबकि देहरादून में सहस्रधारा और मालदेवता में बाढ़ ने सैकड़ों वाहनों और घरों को नुकसान पहुंचाया। पौड़ी के सैंजी और बागेश्वर के कपकोट में सड़कें कट गईं, जिससे चार धाम यात्रा रुकी। मौसम विभाग (IMD) ने रेड अलर्ट जारी किया, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ अनियोजित विकास ने आपदाओं को और घातक बना दिया। चार धाम परियोजना के तहत सड़क चौड़ीकरण से पहाड़ों की संरचना कमजोर हुई, जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ीं। 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद भी सबक नहीं सीखा गया।
धामी सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया: घोषणाओं की बौछार
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आपदा के तुरंत बाद सक्रियता दिखाई। 5 अगस्त को आंध्र प्रदेश दौरे पर रहते हुए उन्होंने टिरुपति से ही रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करने के निर्देश दिए। शाम को देहरादून लौटकर स्टेट इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर (SEOC) में बैठक की। 6 अगस्त को उत्तरकाशी पहुंचे और हेलीकॉप्टर से प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लिया। उन्होंने कहा, “यह बेहद दर्दनाक है, लेकिन हम युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं।” राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से 20 करोड़ रुपये तुरंत जारी किए। केंद्र से सहयोग मांगा, जिस पर गृह मंत्री अमित शाह ने 7 NDRF और 3 ITBP टीमें भेजीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 अगस्त को धामी से बात की और पूर्ण सहायता का आश्वासन दिया।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, रेस्क्यू में सफलता मिली। धराली में 190 लोगों को बचाया गया, जिसमें सेना के चिनूक, मी-17 हेलीकॉप्टरों और HAL ध्रुव का इस्तेमाल हुआ। NDRF की 69 सदस्यीय टीमों ने मलबे में फंसे लोगों की तलाश की, यहां तक कि कैडेवर डॉग्स भी लगाए गए। 7 अगस्त को पौड़ी के सैंजी का दौरा कर प्रभावितों से मिले और राहत राशि वितरित की। 9 अगस्त को धराली के लिए 5 लाख रुपये प्रति मृतक परिवार और पूर्ण क्षतिग्रस्त घरों के मालिकों को घोषित किया। बिल्डिंग मालिकों को 1.30 लाख रुपये की सहायता दी। सितंबर में चमोली के नंदानगर में 20 घायलों को इलाज मुहैया कराया। हेलीकॉप्टरों से राहत सामग्री एयरड्रॉप की गई, बिजली-पानी बहाल किया। 11 सितंबर को PM मोदी के देहरादून दौरे पर 1,200 करोड़ रुपये की सहायता पैकेज का ऐलान हुआ, जिसमें PM CARES से अनाथ बच्चों को सपोर्ट शामिल। धामी ने 8 सितंबर को अधिकारियों के साथ बैठक में पुनर्निर्माण तेज करने, स्थानीय मजदूरों को प्राथमिकता और पर्यटन बहाली के निर्देश दिए। 10 अक्टूबर को 1,029 करोड़ की स्वीकृति दी, जिसमें SDRF से 25 करोड़ ग्रामीण सड़कों के लिए। सरकार का दावा है कि 900 से अधिक फंसे लोगों को सुरक्षित निकाला गया और सड़कें बहाल हो रही हैं।
जमीनी हकीकत: जुमलेबाजी या वास्तविक सहायता?
सरकारी दावे चमकदार हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत कड़वी है। धराली के स्थानीय निवासी मोहम्मद शोएब जैसे मजदूर बताते हैं कि रेस्क्यू देरी से पहुंचा। सड़कें टूटने और बारिश से हेलीकॉप्टर प्रभावित हुए, जिससे 50 से अधिक अभी भी लापता हैं। पुनर्वास समिति का गठन तो हुआ, लेकिन प्रारंभिक रिपोर्ट एक हफ्ते में आने वाली थी—अक्टूबर तक भी कोई ठोस योजना नहीं बनी। 5 लाख की सहायता का पैसा कई परिवारों तक नहीं पहुंचा, क्योंकि दस्तावेजीकरण में देरी। चमोली के नंदानगर में 14 लापता लोगों की तलाश अभी जारी है, लेकिन भूस्खलन के कारण पहुंच मुश्किल। देहरादून के मालदेवता में बाढ़ प्रभावितों को अस्थायी आश्रय तो मिला, लेकिन स्थायी घरों का कोई प्लान नहीं। X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट्स में लोग शिकायत करते हैं: “धामी जी हेलीकॉप्टर से सर्वे करते हैं, लेकिन गांव में बिजली-पानी कब लौटेगा?” एक पोस्ट में ANI का वीडियो दिखाता है जहां धामी बाढ़ प्रभावितों से मिले, लेकिन स्थानीय कहते हैं कि वादे हवा-हवाई हैं।
विपक्ष और विशेषज्ञों की आलोचना जोरदार है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने कहा, “हर साल हिमाचल, उत्तराखंड में यही होता है। चार धाम परियोजना से आपदा बढ़ी।” पूर्व आपदा प्रबंधन निदेशक पियूष रौतेला का कहना है कि अनियोजित निर्माण ने नदियों के प्रवाह को बाधित किया। मंगाबे रिपोर्ट के अनुसार, चार धाम हाईवे से ढलानों की स्थिरता बिगड़ी, जिससे भूस्खलन बढ़े। सुप्रीम कोर्ट की 2021 की सिफारिशों का पालन नहीं हुआ—डीयोडार पेड़ काटे गए, जो पहाड़ों को बांधते हैं। फ्री प्रेस जर्नल में लिखा, “धामी आपदा के बीच ही विवादास्पद कानून ला रहे हैं—एंटी-कन्वर्जन एक्ट सख्ती और स्कूल क्युरिकुलम पर हस्तक्षेप। यह प्रशासनिक विफलता छिपाने की कोशिश है।” सितंबर में देहरादून क्लाउडबर्स्ट के बाद 18 मौतें हुईं, लेकिन सड़कें दो हफ्ते बाद भी बहाल नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के साथ विकास मॉडल बदलना जरूरी, लेकिन धामी सरकार पर्यटन और सड़कों पर जोर दे रही, जो आपदा को न्योता दे रहा।
राजनीतिक आयाम: सहयोग या सियासत?
केंद्र-राज्य समन्वय सराहनीय रहा। PM मोदी का 1,200 करोड़ पैकेज और शाह की NDRF टीमें मददगार साबित हुईं। केरल CM पिनारायी विजयन ने भी सहायता की पेशकश की। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि BJP सरकार आपदा को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही। धामी का Andhra दौरे से लौटना तो त्वरित था, लेकिन पूर्व आपदाओं (2021 चमोली GLOF) के सबक लागू नहीं हुए। X पर #UttarakhandDisaster ट्रेंड में लोग पूछते हैं: “जुमले कब खत्म होंगे?” सरकार ने 8 सितंबर को आपदा प्रबंधन पर व्यापक निर्देश दिए—पर्यटन बहाली, सड़क मरम्मत—लेकिन जमीनी क्रियान्वयन धीमा।
निष्कर्ष: सबक और भविष्य की राह
उत्तराखंड की 2025 आपदा ने साबित कर दिया कि सरकारी मदद घोषणाओं तक सीमित न रहे। धामी सरकार ने रेस्क्यू और वित्तीय सहायता में सक्रियता दिखाई, लेकिन जमीनी हकीकत—देरी, अपूर्ण पुनर्वास और विकास नीतियों की कमियां—जुमलेबाजी का आईना दिखाती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं: हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण-केंद्रित विकास, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मजबूत करें और स्थानीय समुदायों को शामिल करें। यदि 2013 केदरनाथ जैसे सबक लागू हों, तो देवभूमि सुरक्षित रहेगी। अन्यथा, हर मानसून एक नया संकट लाएगा। सरकार को अब क्रियान्वयन पर फोकस करना चाहिए, वादों पर नहीं।
