बिहार SIR विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने EC से मांगा 3.66 लाख वोटरों के नाम काटे जाने का डेटा
बिहार SIR विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने EC से मांगा 3.66 लाख वोटरों के नाम काटे जाने का डेटा
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई ने नया मोड़ ले लिया है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग (EC) से उन 3.66 लाख मतदाताओं का विस्तृत डेटा मांगा है, जिनके नाम फाइनल वोटर लिस्ट से काटे गए हैं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ये नाम किन आधारों पर हटाए गए और क्या प्रभावित लोगों को उचित सूचना दी गई। अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को तय की गई है, जिसमें EC को ड्राफ्ट और फाइनल लिस्ट की तुलना वाली रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
SIR प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण
बिहार में SIR अभियान 24 जून 2025 से शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य वोटर लिस्ट को अपडेट करना और डुप्लीकेट या अयोग्य एंट्रीज को हटाना था। प्रारंभिक ड्राफ्ट लिस्ट (1 अगस्त 2025) में कुल 7.24 करोड़ मतदाताओं के नाम थे, लेकिन उससे पहले की 7.89 करोड़ की सूची से करीब 65 लाख नाम हटाए गए थे। आपत्तियों और सत्यापन के बाद 30 सितंबर को फाइनल लिस्ट जारी हुई, जिसमें कुल 7.42 करोड़ मतदाता हैं। इस दौरान:
– नए नाम जोड़े गए: 21.53 लाख (ज्यादातर युवा और नए वोटर)।
– ड्राफ्ट से हटाए गए: 3.66 लाख (अयोग्य घोषित)।
– कुल कमी: 24 जून की सूची से लगभग 47 लाख नाम कम (65 लाख हटाए गए माइनस 21 लाख जोड़े गए)।
विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि SIR के नाम पर बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। कांग्रेस का दावा है कि हटाए गए नामों में 23 लाख महिलाओं और कई मुस्लिम बहुल इलाकों के वोटर शामिल हैं, जो 2020 के करीबी मुकाबले वाली 59 सीटों से हैं।
किन आधारों पर काटे गए 3.66 लाख नाम?
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ये नाम तीन मुख्य कारणों से हटाए गए हैं। आयोग ने सॉफ्टवेयर-आधारित मिलान, फील्ड वेरिफिकेशन और दस्तावेज जांच के जरिए यह प्रक्रिया पूरी की:
1. मृत मतदाता: जिन वोटरों की मृत्यु हो चुकी है, उनके नाम हटाए गए। आयोग ने स्थानीय रिकॉर्ड और परिवारों से प्राप्त जानकारी के आधार पर यह किया।
2. डुप्लीकेट एंट्री: एक ही व्यक्ति के नाम एक से अधिक जगह दर्ज होने पर अतिरिक्त एंट्रीज हटाई गईं। सॉफ्टवेयर ने नाम, पता और जन्मतिथि मिलान किया।
3. पता परिवर्तित या अयोग्य: जिन वोटरों का पता बदल चुका है या जो अब उस निर्वाचन क्षेत्र में नहीं रहते, उनके नाम हटाए गए। साथ ही, फर्जी या अपूर्ण दस्तावेज वाले मामलों को भी शामिल किया गया।
EC के अनुसार, हटाए गए वोटरों को नोटिस भेजा गया था और राजनीतिक दलों को सूचियां उपलब्ध कराई गईं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि ज्यादातर प्रभावित लोग गरीब, महिलाएं या अल्पसंख्यक हैं, जिन्हें सूचना नहीं मिली। योगेंद्र यादव जैसे कार्यकर्ताओं ने अनुपातहीन बहिष्कार का आरोप लगाया।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची) ने सुनवाई के दौरान EC से स्पष्ट जवाब मांगा। कोर्ट ने कहा, “यदि कोई वास्तविक पीड़ित है, तो उसे सुना जाएगा।” आयोग ने दावा किया कि अभी तक कोई औपचारिक शिकायत नहीं आई, लेकिन कोर्ट ने डेटा सार्वजनिक करने और प्रभावितों को ऑनलाइन फॉर्म-6 के जरिए नाम जोड़ने का मौका देने का निर्देश दिया। आधार कार्ड सहित 11 दस्तावेज मान्य होंगे।
विपक्ष का कहना है कि यह प्रक्रिया सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाने वाली है, जबकि EC इसे पारदर्शी बताता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना राजनीतिक सहमति के SIR जैसी प्रक्रियाएं विवादास्पद रहेंगी।
