हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ विवाद: इस्लामिक कानून और राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर क्यों मचा बवाल?
हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ विवाद: इस्लामिक कानून और राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर क्यों मचा बवाल?
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में डल झील के किनारे स्थित हजरतबल दरगाह में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ को लेकर छिड़ा विवाद सुर्खियों में है। दरगाह के जीर्णोद्धार के बाद 3 सितंबर को लगाए गए एक शिलापट्ट पर अशोक स्तंभ उकेरा गया था, जिसे 5 सितंबर को ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के मौके पर कुछ लोगों ने इस्लामिक मान्यताओं का हवाला देते हुए तोड़ दिया। इस घटना ने धार्मिक भावनाओं, इस्लामिक कानून, और राष्ट्रीय प्रतीक की गरिमा को लेकर देशव्यापी बहस छेड़ दी है। पुलिस ने 26 लोगों को हिरासत में लिया है, और मामला राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 और बीएनएस की धाराओं के तहत दर्ज किया गया है।
विवाद का कारण
हजरतबल दरगाह, जहां पैगंबर मोहम्मद का पवित्र अवशेष (मोई-ए-मुकद्दस) रखा है, मुस्लिम समुदाय के लिए अत्यंत पवित्र स्थल है। जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड ने दरगाह के नवीनीकरण के बाद एक शिलापट्ट लगाया, जिसमें अशोक स्तंभ अंकित था। कुछ स्थानीय लोगों और नेताओं ने इसे इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ बताया, क्योंकि इस्लाम में तौहीद (एकेश्वरवाद) के तहत मूर्तियों या जीव-जंतुओं की आकृतियों को धार्मिक स्थलों पर लगाना निषिद्ध माना जाता है। शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद भीड़ ने शिलापट्ट पर पथराव कर अशोक स्तंभ को क्षतिग्रस्त कर दिया।
इस्लामिक कानून क्या कहता है?
आज तक से बातचीत में इस्लामिक स्कॉलर मौलाना सय्यद अहमद नदवी ने बताया, “इस्लाम में तौहीद का सिद्धांत सर्वोपरि है। धार्मिक स्थलों पर किसी भी ऐसी आकृति को रखना, जो मूर्तिपूजा या बुतपरस्ती की ओर इशारा करे, इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ माना जाता है। अशोक स्तंभ में चार शेरों की आकृति है, जिसे कुछ लोग मूर्ति के रूप में देख सकते हैं।” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है, और इसे तोड़ना गलत है। स्कॉलर ने सुझाव दिया कि धार्मिक स्थलों पर राष्ट्रीय प्रतीकों का उपयोग करने से पहले समुदाय की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए।
कानूनी स्थिति
‘द स्टेट इमब्लेम ऑफ इंडिया (प्रोहिबिशन ऑफ इमप्रॉपर यूज) एक्ट, 2005’ के अनुसार, अशोक स्तंभ का उपयोग केवल सरकार, राज्य सरकार, या अधिकृत संस्थाएं कर सकती हैं। बिना अनुमति इसका उपयोग अपराध है, और इसे नुकसान पहुंचाने पर राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत सात साल तक की सजा या जुर्माना हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के वकील कुमार आंजनेय शानू ने कहा, “धार्मिक स्थल पर अशोक स्तंभ लगाना कानूनन गलत हो सकता है, अगर यह बिना अनुमति किया गया हो। लेकिन इसे तोड़ना भी गंभीर अपराध है।”
सियासी बयानबाजी
– उमर अब्दुल्ला (मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर): “धार्मिक स्थल पर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की जरूरत नहीं थी। यह गलती थी, जिससे बचा जा सकता था।” उन्होंने वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन दरख्शां अंद्राबी से माफी मांगने को कहा।
– फारूक अब्दुल्ला (नेशनल कॉन्फ्रेंस): “हजरतबल का निर्माण लोगों के योगदान से हुआ है। शिलापट्ट लगाना गलत था, लेकिन इसे तोड़ना भी ठीक नहीं।”
– दरख्शां अंद्राबी (वक्फ बोर्ड चेयरपर्सन): “यह राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान और आतंकी कृत्य है। दोषियों पर UAPA और PSA के तहत कार्रवाई हो।”
– बीजेपी: पार्टी ने इसे राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान बताया और सख्त कार्रवाई की मांग की।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों के अनुसार, अशोक स्तंभ को 1950 में संविधान सभा ने धर्मनिरपेक्ष प्रतीक के रूप में चुना था, जो सत्य, अहिंसा और न्याय का प्रतीक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसे धार्मिक प्रतीक के रूप में देखना गलत है, लेकिन धार्मिक स्थलों पर इसका उपयोग संवेदनशीलता के साथ करना चाहिए।
हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ का विवाद धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रीय प्रतीक की गरिमा के बीच टकराव को दर्शाता है। इस्लामिक कानून में मूर्तियों से संबंधित सख्ती के कारण कुछ लोगों ने इसे अनुचित माना, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीक को नुकसान पहुंचाना कानूनी और संवैधानिक रूप से गंभीर अपराध है। इस घटना ने धार्मिक स्थलों पर सरकारी प्रतीकों के उपयोग पर नई बहस छेड़ दी है।
