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Explainer: इजरायल की सत्ता की चाबी अब अरब मुस्लिमों के हाथ में: 19 सीटों वाले किंगमेकर जिन्होंने नेतन्याहू की राह रोक दी

Explainer: इजरायल की सत्ता की चाबी अब अरब मुस्लिमों के हाथ में: 19 सीटों वाले किंगमेकर जिन्होंने नेतन्याहू की राह रोक दी

इजरायल के 27 अक्टूबर 2026 के चुनाव के नतीजे आते ही सियासी गणित पूरी तरह बदल गया है। न तो प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को बहुमत मिला है और न ही विपक्षी गठबंधन को। ऐसे में लगभग 19 सीटें हासिल करने वाली अरब पार्टियां अब सत्ता की असली चाबी बन गई हैं।​

कौन हैं ये अरब मुस्लिम?

ये इजरायल के वे अरब नागरिक हैं जो 1948 में इजरायल राज्य बनने के बाद देश की सीमाओं के अंदर रह गए फिलिस्तीनियों के वंशज हैं। इजरायल की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 20-21 प्रतिशत है। इनमें ज्यादातर सुन्नी मुसलमान हैं, साथ ही ईसाई और द्रूज भी शामिल हैं। ये पूर्ण इजरायली नागरिक हैं, वोट देते हैं, संसद (नेसेट) में पहुंचते हैं और देश की राजनीति का हिस्सा हैं। इन्हें अक्सर “इजरायली अरब” या “फिलिस्तीनी नागरिक ऑफ इजरायल” कहा जाता है।​

दशकों तक इनकी राजनीतिक आवाज हाशिए पर रही। लेकिन इस बार अरब बहुल इलाकों में रिकॉर्ड मतदान (कई जगह 70-80 प्रतिशत तक) देखने को मिला। नतीजा—अरब पार्टियों का अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन।

कौन-कौन सी पार्टियां और कितनी ताकत?

दो मुख्य अरब-बहुल सूचियां सामने आई हैं:

जॉइंट लिस्ट (Hadash, Ta’al और Balad का गठबंधन): करीब 12 सीटें। नेता यूसुफ जबरीन, अहमद तिबी जैसे अनुभवी चेहरे इसमें शामिल हैं। ये पारंपरिक रूप से सरकार में शामिल होने से बचती रही है, लेकिन नेतन्याहू को हटाने के लिए बाहर से समर्थन देने को तैयार है।

रा’अम (यूनाइटेड अरब लिस्ट): करीब 7 सीटें। नेता मंसूर अब्बास। यह इस्लामी आंदोलन की दक्षिणी शाखा से जुड़ी है। 2021 में अब्बास ने इतिहास रचते हुए पहली बार स्वतंत्र अरब पार्टी के रूप में बेनेट-लापिड सरकार में जगह बनाई थी। अब भी वे व्यावहारिक राजनीति (बजट, अपराध नियंत्रण, बुनियादी सुविधाएं) पर जोर देते हुए गठबंधन में शामिल होने को तैयार दिख रहे हैं।​

दोनों मिलाकर 19 सीटें—ये आंकड़ा पहले के रिकॉर्ड (2020 में 15 सीटें) से भी आगे है।

सत्ता का समीकरण कैसे बदल गया?

ताजा आंकड़ों के मुताबिक (लगभग 90 प्रतिशत वोट गिने जा चुके हैं):

नेतन्याहू का ब्लॉक: करीब 53 सीटें (बहुमत के लिए 61 से 8 कम)

गादी आइजेनकोट का विपक्षी ब्लॉक: करीब 48 सीटें

अरब पार्टियों की 19 सीटें जोड़ दी जाएं तो विपक्षी खेमा आसानी से 61 पार कर सकता है। यानी नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने का गणित अब अरब वोटों पर निर्भर है। लेकिन समस्या ये है कि कई विपक्षी नेता (खासकर नाफ्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन) अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने से पहले से ही इनकार करते रहे हैं। वे इसे “जायोनिस्ट सरकार” की शर्त मानते हैं।​

क्या अब वाकई सत्ता इनके हाथ में है?

अरब पार्टियां खुद कह रही हैं कि वे नेतन्याहू को हटाने के लिए तैयार हैं—चाहे सरकार में शामिल होकर या बाहर से समर्थन देकर। मंसूर अब्बास ने साफ कहा है कि वे “चेंज ब्लॉक” के साथ काम करने को तैयार हैं। लेकिन विपक्ष की हिचक के कारण ये “किंगमेकर” पूरी तरह सत्ता नहीं चला पाएंगे, बल्कि ब्लॉकिंग और इनेबलिंग पावर जरूर रखेंगे। यानी नेतन्याहू को बहुमत दिलाने से रोक सकते हैं और विपक्ष को रास्ता खोल सकते हैं।

यह पहली बार नहीं है जब अरब पार्टियां केंद्र में आई हों। 2021 में रा’अम ने सरकार का हिस्सा बनकर दिखाया था कि व्यावहारिक राजनीति संभव है। अब 2026 के चुनाव ने साबित कर दिया है कि इजरायल की 20 प्रतिशत अरब आबादी अब हाशिए पर नहीं रहना चाहती। सवाल ये है कि यहूदी-बहुल पार्टियां इस नई हकीकत को स्वीकार करेंगी या नहीं।

इजरायल की राजनीति अब पहले से कहीं ज्यादा जटिल और दिलचस्प मोड़ पर है। सत्ता की चाबी अब उन हाथों में है जिन्हें लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया जाता रहा।

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