Gen Z की गूंज तो सुनाई, लेकिन वोट की गूंज क्यों नहीं? आखिर कहां पिछड़ रहे हैं राहुल गांधी?
Gen Z की गूंज तो सुनाई, लेकिन वोट की गूंज क्यों नहीं? आखिर कहां पिछड़ रहे हैं राहुल गांधी?
राहुल गांधी की “छात्रों की गूंज” अभियान शुरू हुए तीन महीने से ज्यादा हो गए हैं। कोटा के दशहरा मैदान से शुरू हुई ये मुहिम देहरादून, प्रयागराज, पुणे होते हुए हाल ही में इंदौर पहुंच चुकी है। हर कार्यक्रम में हजारों युवा जुट रहे हैं, पेपर लीक, महंगी शिक्षा, भर्तियों में देरी और बेरोजगारी जैसे मुद्दे गरज रहे हैं। राहुल गांधी खुद मंच पर छात्रों को बुला रहे हैं, उनकी कहानियां सुन रहे हैं और “सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स” का नारा गूंज रहा है। पार्टी इसे 800 जिलों तक ले जाने की बात कर रही है। फिर भी सवाल वही है—क्यों कांग्रेस जेन जी को अभी तक अपने पाले में नहीं खींच पा रही?
गूंज तो है, लेकिन जड़ें कमजोर
जून 2026 में कोटा से शुरू हुआ यह अभियान असल में छात्र आक्रोश को राजनीतिक रूप देने की कोशिश है। पेपर लीक स्कैंडल्स, कोचिंग की लूट, डिग्री के बावजूद नौकरी न मिलना—ये सब मुद्दे जेन जी की रोजमर्रा की जिंदगी हैं। पुणे में सिर्फ छात्राओं के कार्यक्रम में राहुल गांधी ने “पैट्रिआर्की तोड़ो” तक कहा। इंदौर में उन्होंने साफ कहा कि सिस्टम को “अंधभक्त” चाहिए, सवाल पूछने वाले छात्र नहीं। भीड़ जुट रही है, सोशल मीडिया पर क्लिप्स वायरल हो रहे हैं।
लेकिन भीड़ और वोट के बीच की दूरी अभी भी बहुत बड़ी है। पिछले लोकसभा चुनावों में युवा मतदाताओं (18-25 साल) में भाजपा का हिस्सा लगातार एक-तिहाई से ऊपर रहा, जबकि कांग्रेस 20 प्रतिशत के आसपास ही अटकी रही। जेन जी (1997-2012 के बीच जन्मे) अब सबसे बड़ा वोटिंग ब्लॉक बनने वाला है, फिर भी पारंपरिक पार्टियों से दूरी बनाए हुए है।
क्यों नहीं चिपक रहा कनेक्शन?
पहली वजह है विश्वास का संकट। जेन जी पारंपरिक राजनीति को लेकर संदेह रखता है। वे देख चुके हैं कि कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही, फिर भी शिक्षा और रोजगार की बुनियादी समस्याएं जस की तस रहीं। अब जब राहुल गांधी “सिस्टम” की आलोचना करते हैं, तो कई युवा पूछते हैं—आपके समय में क्या अलग था? पार्टी की छवि अभी भी “वंशवाद” और पुरानी लीडरशिप से जुड़ी हुई है। जेन जी को लगता है कि वे सिर्फ मंच पर बुलाए जा रहे हैं, असली फैसला लेने वाले नहीं बने।
दूसरी वजह है विकल्प की कमी। मुद्दे सही हैं, लेकिन ठोस वैकल्पिक मॉडल कमजोर है। “सस्ती शिक्षा, निष्पक्ष परीक्षा, सम्मानजनक नौकरी”—ये मांगें अच्छी हैं, लेकिन कैसे लागू होंगी, इसका रोडमैप साफ नहीं दिखता। वहीं भाजपा लगातार “विकास”, “राष्ट्रवाद” और “आत्मनिर्भर भारत” की कहानी बेच रही है। युवाओं के लिए सरकारी नौकरी का सपना अब भी मजबूत है, लेकिन प्राइवेट सेक्टर, स्टार्टअप और गिग इकोनॉमी की भाषा में कांग्रेस अभी उतनी सहज नहीं लगती।
तीसरी बड़ी बात है संगठन और पहुंच। कांग्रेस के छात्र संगठन (एनएसयूआई) और युवा कांग्रेस कई जगह कमजोर पड़ चुके हैं। कई कार्यक्रमों में मंच पर बुलाए गए “छात्रों” में से कुछ पार्टी से जुड़े निकले—यह बात भाजपा ने तुरंत मुद्दा बना दी। जेन जी बहुत जल्दी “स्टेज-मैनेज्ड” चीजों को पकड़ लेता है। जंतर मंतर पर कॉक्रोच जनता पार्टी जैसे स्वतंत्र छात्र आंदोलन ने जो ऊर्जा दिखाई, उसे पारंपरिक पार्टियां अभी तक अपने अंदर समाहित नहीं कर पाईं। शशि थरूर ने खुद स्वीकार किया था कि विपक्ष ने युवाओं को पार्टी में सार्थक जगह नहीं दी।
चौथी वजह है जेन जी की अपनी प्रकृति। ये पीढ़ी सोशल मीडिया पर सक्रिय है, लेकिन पारंपरिक वोटिंग पैटर्न से कम जुड़ी हुई है। वे मुद्दों पर सड़क पर उतर सकते हैं, लेकिन मतदान केंद्र पर कम। कई सर्वे बताते हैं कि युवा मतदान प्रतिशत पिछले चुनावों में गिरा है। वे “अपोलिटिकल” रहना पसंद करते हैं या फिर किसी एक पार्टी से हमेशा के लिए बंधना नहीं चाहते।
भाजपा की काउंटर और कांग्रेस की मजबूरी
भाजपा खामोश नहीं बैठी। वह भी युवाओं को टारगेट कर रही है—सेल्फी स्टाइल वीडियो, जेन जी लेंग्वेज में संदेश। प्रधानमंत्री मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे नेता लगातार युवाओं से संवाद कर रहे हैं। “छत्रों की गूंज” को “झूठ की गूंज” कहकर खारिज करने की कोशिश भी हो रही है।
कांग्रेस के लिए चुनौती और बड़ी है क्योंकि उसे न सिर्फ नए वोटर बनाने हैं, बल्कि पुराने विश्वास को भी सुधारना है। सिर्फ कार्यक्रम कराने से काम नहीं चलेगा। पार्टी को युवाओं को टिकट देना होगा, स्थानीय नेतृत्व में जगह देनी होगी और अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलना होगा।
आगे क्या?
“छात्रों की गूंज” अभी अपनी शुरुआती स्टेज पर है। 28 कार्यक्रमों का पहला फेज और फिर 100 कार्यक्रमों का दूसरा फेज—यह लंबी दौड़ है। 2029 के लोकसभा चुनाव तक जेन जी और बड़ा वोटिंग ब्लॉक बन चुका होगा। अगर कांग्रेस सिर्फ आक्रोश को हवा देकर छोड़ दे और ठोस संगठनात्मक बदलाव न लाए, तो गूंज सिर्फ गूंज ही रह जाएगी।
जेन जी को नारे नहीं, समाधान चाहिए। उन्हें मंच पर बुलाए जाने से ज्यादा, फैसला लेने की मेज पर जगह चाहिए। जब तक कांग्रेस यह समझ नहीं लेती, राहुल गांधी की गूंज कितनी भी तेज क्यों न हो—वोट की गूंज दूर ही रहेगी।
सवाल यही है—क्या कांग्रेस सिर्फ सुन रही है, या वाकई बदलने को तैयार है? जेन जी इंतजार कर रहा है।
