जन्माष्टमी पर दही हांडी की परंपरा: श्रीकृष्ण की बाल लीला, माखन चोरी और ‘गोविंदा’ टोली के मानव पिरामिड का महत्व
जन्माष्टमी पर दही हांडी की परंपरा: श्रीकृष्ण की बाल लीला, माखन चोरी और ‘गोविंदा’ टोली के मानव पिरामिड का महत्व
भोपाल/मुंबई: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान कान्हा की नटखट बाल लीलाएं और गोपियों संग माखन चुराने के किस्से एक बार फिर जीवंत हो उठते हैं। इसी पौराणिक बाल लीला को जीवंत रूप देने के लिए जन्माष्टमी के अगले दिन देशभर में दही हांडी (गोविंदा आला रे) का उत्सव बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
पौराणिक मान्यता: गोपियों की सतर्कता और कान्हा का ‘मानव पिरामिड’
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बालकृष्ण को माखन और दही अत्यंत प्रिय था। वे गोकुल की गलियों में अपने बाल-सखाओं के साथ मिलकर गोपियों के घरों से माखन चुराकर खाया करते थे।
ऊंचाई पर मटकी लटकाना: नटखट कान्हा से माखन बचाने के लिए गोपियों ने दही-माखन से भरी मटकियों को घर की छतों या सीलिंग से काफी ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया।
मानव पिरामिड की शुरुआत: कान्हा और उनके दोस्तों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया। वे एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड (Human Pyramid) बनाते थे और सबसे ऊपर खड़ा सखा मटकी फोड़कर माखन बांट लेता था।
कैसे मनाया जाता है दही हांडी का पर्व?
दही हांडी उत्सव में इसी बाल लीला का प्रतीकात्मक रूप देखने को मिलता है:
ऊंचाई पर हांडी: मिट्टी की मटकी (हांडी) में दही, मक्खन, सूखे मेवे और सिक्के भरकर उसे रस्सियों के सहारे काफी ऊंचाई पर लटकाया जाता है।
’गोविंदा’ टोली की परीक्षा: युवाओं की टोलियां, जिन्हें ‘गोविंदा’ कहा जाता है, ढोल-नगाड़ों और “गोविंदा आला रे” के जयकारों के बीच मानव पिरामिड बनाकर हांडी तक पहुंचने का प्रयास करती हैं।
माखन की बरसात: सबसे ऊपरी पायदान पर मौजूद गोविंदा हांडी को फोड़ता है, जिसके बाद दही और माखन की बौछार के साथ पूरा माहौल उत्साह से सराबोर हो जाता है।
महाराष्ट्र में विशेष आकर्षण और भव्यता
हालांकि दही हांडी की धूम अब पूरे देश में देखी जाती है, लेकिन महाराष्ट्र (विशेषकर मुंबई और ठाणे) में इसका आयोजन भव्य पैमाने पर होता है। यहां कई मंजिलों की ऊंचाई तक दही हांडी बांधी जाती है और इसे फोड़ने वाली विजयी गोविंदा टोलियों के लिए लाखों रुपये के आकर्षक पुरस्कार और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
