Thursday, September 3, 2026
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गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र की छोटी झीलों से तत्काल बड़े खतरे की स्थिति नहीं: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान

गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र की छोटी झीलों से तत्काल बड़े खतरे की स्थिति नहीं: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान

​देहरादून: गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र में छोटी हिमनदीय झीलों (Glacial Lakes) के उभरने और उनसे संभावित खतरे को लेकर मीडिया में आ रही खबरों पर विराम लग गया है। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG), देहरादून ने स्पष्ट किया है कि ये झीलें बेहद छोटी और अस्थायी प्रकृति की हैं, जिनसे किसी बड़े खतरे या ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) की तत्काल कोई संभावना नहीं है।

​वाडिया संस्थान की वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

​अस्थायी सुप्राग्लेशियल झीलें: सेटेलाइट इमेज और क्षेत्रीय अवलोकनों के अनुसार, ये झीलें मुख्यतः ग्लेशियर की सतह पर बर्फ पिघलने से बनी हैं। तापमान, हिमपिघलन और सतही बदलावों के कारण इनका आकार और जल स्तर तेजी से बदलता रहता है तथा जल निकास के बाद यह स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

​कम जल आयतन: इन झीलों का आकार और जल धारण क्षमता बेहद कम है। इसलिए इनमें विशाल मात्रा में पानी एकत्र होने की क्षमता नहीं होती, जो किसी भीषण आपदा का कारण बन सके।

​प्राकृतिक मौसमी प्रक्रिया: गंगोत्री क्षेत्र में समय-समय पर ऐसी सुप्राग्लेशियल झीलों का बनना और गायब होना ग्लेशियर की एक सामान्य और प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

​सतत निगरानी और आपदा प्रबंधन

​विस्तृत आकलन का पैमाना: वाडिया संस्थान के अनुसार, हर झील को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। किसी भी हिमनदीय झील के जोखिम का आकलन उसके आकार, जल आयतन, बांध की संरचना और निकासी मार्ग के समग्र अध्ययन के बाद ही किया जाता है।

​सैटेलाइट और फील्ड मॉनिटरिंग जारी: USDMA और वाडिया संस्थान मिलकर हिमालयी ग्लेशियरों और इन झीलों की उपग्रह आधारित नियमित निगरानी (Satellite Monitoring) तथा वैज्ञानिक सर्वेक्षण लगातार कर रहे हैं ताकि किसी भी संभावित बदलाव की समय रहते पहचान की जा सके।

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