कोरियाई प्रायद्वीप फिर बना बड़ी शक्तियों की कूटनीति का केंद्र, ट्रंप-किम मुलाकात और चीन की सक्रियता ने बढ़ाई हलचल
कोरियाई प्रायद्वीप फिर बना बड़ी शक्तियों की कूटनीति का केंद्र, ट्रंप-किम मुलाकात और चीन की सक्रियता ने बढ़ाई हलचल
सोल/वॉशिंगटन: कोरियाई प्रायद्वीप एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में दिखाई दे रहा है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन से मुलाकात की संभावना जताई है, वहीं दूसरी ओर चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सोल में कहा है कि बीजिंग कोरियाई प्रायद्वीप में शांति और स्थिरता के लिए अपनी “रचनात्मक भूमिका” जारी रखेगा।
दोनों घटनाक्रमों को साथ देखा जाए तो अमेरिका और चीन की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं साफ नजर आती हैं।
ट्रंप ने किम से मुलाकात का दिया संकेत
व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ट्रंप ने उत्तर कोरिया को लेकर कहा कि उनके किम जोंग-उन के साथ रिश्ते अच्छे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस साल किम से मुलाकात करेंगे।
ट्रंप और किम के बीच उनके पहले कार्यकाल के दौरान 2018 और 2019 में तीन बैठकें हुई थीं। हालांकि, इन बैठकों के बावजूद उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका था।
इस बार स्थिति इसलिए भी अलग मानी जा रही है क्योंकि उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमता को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आ रहे हैं।
उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों पर अलग-अलग अनुमान
ट्रंप ने दावा किया कि उत्तर कोरिया के पास 57 बेहद शक्तिशाली परमाणु हथियार हैं। वहीं दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक ने संसद में बताया कि आम तौर पर प्योंगयांग के पास 80 से 120 परमाणु हथियार होने का अनुमान लगाया जाता है।
आंकड़ों में यह अंतर बताता है कि उत्तर कोरिया की मौजूदा परमाणु क्षमता को लेकर स्थिति कितनी जटिल है। प्योंगयांग अब अपने परमाणु कार्यक्रम को केवल बातचीत के दबाव के साधन के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा और शासन की निरंतरता से भी जोड़कर देखता है।
चीन ने भी स्पष्ट की अपनी भूमिका
इसी बीच चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सोल में दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्री चो ह्यून से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि चीन कोरियाई प्रायद्वीप में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने में अपनी रचनात्मक भूमिका जारी रखेगा।
वांग यी ने उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच धीरे-धीरे शांति और सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ने की इच्छा का भी समर्थन किया।
चीन के लिए कोरियाई प्रायद्वीप का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि उत्तर कोरिया उसका महत्वपूर्ण रणनीतिक पड़ोसी है। बीजिंग किसी युद्ध या बड़े परमाणु संकट से बचना चाहता है, क्योंकि इससे उसकी सीमा पर अस्थिरता बढ़ सकती है और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी और मजबूत हो सकती है।
दक्षिण कोरिया के सामने बड़ी चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम में दक्षिण कोरिया की स्थिति सबसे संवेदनशील है। उसकी सुरक्षा अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन पर निर्भर है, जबकि चीन उसके लिए महत्वपूर्ण पड़ोसी और बड़ा आर्थिक साझेदार है।
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने कोरियाई युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने के लिए बहुपक्षीय बातचीत का प्रस्ताव भी रखा है। 1950-53 का कोरियाई युद्ध युद्धविराम के साथ रुका था, लेकिन दोनों कोरियाई देश तकनीकी रूप से आज भी युद्ध की स्थिति में हैं।
अमेरिका और चीन की प्राथमिकताएं अलग
अमेरिका की प्राथमिकता उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ दक्षिण कोरिया की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। वहीं चीन का मुख्य उद्देश्य अपने पड़ोस में युद्ध और अस्थिरता को रोकना तथा ऐसा कोई घटनाक्रम टालना है जिससे अमेरिकी सैन्य प्रभाव उसकी सीमा के और करीब पहुंचे।
इसी वजह से बीजिंग तनाव कम रखने और बातचीत के रास्ते खुले रखने पर जोर देता रहा है।
ट्रंप-किम वार्ता बनी तो कई सवाल होंगे अहम
अगर ट्रंप और किम के बीच इस साल दोबारा बातचीत होती है तो चर्चा सिर्फ उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं रहेगी। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका पूर्वी एशिया में अपनी सैन्य भूमिका को किस तरह देखता है, चीन वार्ता में कितना प्रभाव डालता है और दक्षिण कोरिया अपनी सुरक्षा तथा कूटनीतिक स्वतंत्रता के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।
फिलहाल ट्रंप का प्योंगयांग से सीधे संवाद का संकेत और वांग यी की सोल यात्रा यह स्पष्ट करती है कि कोरियाई प्रायद्वीप एक बार फिर अमेरिका और चीन के बीच व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।
