NALSAR विवाद: BCI ने कुछ घंटों में वापस लिया नामांकन रोकने का आदेश, ओवैसी ने छात्रों का किया समर्थन
NALSAR विवाद: BCI ने कुछ घंटों में वापस लिया नामांकन रोकने का आदेश, ओवैसी ने छात्रों का किया समर्थन
हैदराबाद: हैदराबाद स्थित नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) यूनिवर्सिटी से जुड़ा विवाद गुरुवार को दिनभर चर्चा में रहा। विवाद के बीच बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने पहले विश्वविद्यालय के 2026 बैच के छात्रों के वकालत में नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया, लेकिन कुछ ही घंटों बाद यह फैसला वापस ले लिया।
मामला विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की प्रस्तावित मौजूदगी के विरोध से जुड़ा है। कुछ छात्रों ने CJI की मौजूदगी को लेकर विरोध अभियान चलाया था।
पहले नामांकन पर लगाई रोक
विरोध के बाद BCI ने राज्य बार काउंसिलों को NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का नामांकन नहीं करने का निर्देश दिया। इस फैसले पर कानूनी और संस्थागत स्तर पर सवाल उठने लगे।
बाद में BCI ने अपना आदेश वापस लेते हुए स्पष्ट किया कि NALSAR के 2026 बैच के छात्र अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में नामांकन कराने के हकदार हैं।
ओवैसी ने BCI की कार्रवाई पर उठाए सवाल
AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने छात्रों के समर्थन में BCI की कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की मौजूदगी का विरोध करने के कारण छात्रों के पेशेवर भविष्य को प्रभावित करने का अधिकार BCI को किस कानून के तहत मिलता है।
ओवैसी ने कहा कि छात्रों को अपनी राय रखने और किसी कार्यक्रम का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने का अधिकार है। उनके मुताबिक, असहमति को लेकर छात्रों के करियर को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।
स्वतंत्र सोच को लेकर भी जताई चिंता
ओवैसी ने आरोप लगाया कि इस तरह की कार्रवाई विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र सोच और आलोचनात्मक विमर्श को कमजोर कर सकती है। उन्होंने कहा कि कानून विश्वविद्यालयों का उद्देश्य छात्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने और अलग-अलग विचारों पर चर्चा करने के लिए तैयार करना है।
BCI ने बदला फैसला
दिनभर चले विवाद के बाद BCI ने अपना पहले का आदेश वापस ले लिया। इसके बाद 2026 बैच के छात्रों के लिए बार काउंसिल में नामांकन का रास्ता साफ हो गया।
BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की ओर से भी संकेत दिया गया कि मामले में आगे किसी तरह की जांच या कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक तरफ छात्रों के अभिव्यक्ति और असहमति के अधिकार को लेकर बहस छेड़ दी है, वहीं दूसरी ओर बार काउंसिल की शक्तियों और उनके इस्तेमाल पर भी सवाल खड़े किए हैं।
