राम मंदिर दान हेराफेरी: SC का नोटिस, SIT रिपोर्ट तलब / तमिलनाडु गोहत्या बैन पर SC की रोक
अयोध्या राम मंदिर दान हेराफेरी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्य सरकार और ट्रस्ट को जारी किया नोटिस; SIT से मांगी स्टेटस रिपोर्ट
नई दिल्ली:
अयोध्या स्थित भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे और दान राशि में कथित वित्तीय हेराफेरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा संज्ञान लिया है। सोमवार को हुई एक अहम सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच कर रही उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष जांच दल (SIT) को अब तक की कार्रवाई की स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है।
इन जनहित याचिकाओं पर हुई सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस मामले से जुड़ी कई जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की। इन याचिकाओं में राजद (RJD) सांसद सुधाकर सिंह, अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी, वकील अजय कुमार राय व दिनेश कुमार यादव और ‘हिन्दू धर्म परिषद’ की याचिकाएं शामिल हैं। इन सभी ने राम मंदिर ट्रस्ट को मिले अरबों रुपये के दान के प्रबंधन में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए अदालत की निगरानी में निष्पक्ष जांच की मांग की है।
सीलबंद लिफाफे में आएगी SIT की रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से अपील की कि 123 साल के लंबे कानूनी संघर्ष के बाद मंदिर बना है, लेकिन अब यह नया विवाद शुरू हो गया है। उन्होंने मामले से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूतों को तुरंत सुरक्षित रखने की मांग की।
सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी मामले की गहराई से जांच कर रही है और इसकी स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सीधे कोर्ट के समक्ष दाखिल की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई आगामी सोमवार के लिए सूचीबद्ध कर दी है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला राम मंदिर में भक्तों द्वारा चढ़ाए गए नकद, सोने-चांदी और अन्य कीमती सामान के कथित गबन और गलत इस्तेमाल से जुड़ा है। इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 जून को एक हाई-लेवल एसआईटी का गठन किया था। इस मामले में अब तक 8 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि चौतरफा दबाव के बीच राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा पहले ही अपने पदों से इस्तीफा दे चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट से तमिलनाडु सरकार को बड़ी राहत: मद्रास हाईकोर्ट के ‘गोहत्या पूर्ण प्रतिबंध’ के फैसले पर लगाई रोक
नई दिल्ली:
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु में गोहत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने वाले मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। मद्रास हाईकोर्ट ने बीते 27 मई को एक विवादित फैसला सुनाते हुए 1976 के एक सरकारी आदेश के हवाले से पूरे तमिलनाडु में गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया: तमिलनाडु सरकार
न्यायमुूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई। अदालत में राज्य सरकार का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी और अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रशांतो सेन ने दलील दी कि मद्रास हाईकोर्ट का यह आदेश ‘तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958’ के मूल प्रावधानों के खिलाफ है।
राज्य सरकार के मुताबिक, मौजूदा कानून के तहत 10 साल से अधिक उम्र की उन गायों के वध की अनुमति है जो खेती, काम करने या प्रजनन (प्रॉडक्शन) के लिए उपयुक्त नहीं रह गई हैं। सरकार ने तर्क दिया कि कानून पशु वध को ‘नियंत्रित’ करता है, न कि उस पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ लगाता है। ऐसे में हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह फैसला सुनाया था।
के. सूर्या की याचिका पर आया था आदेश
गौरतलब है कि यह पूरा विवाद कोयंबटूर के निवासी के. सूर्या द्वारा दायर एक जनहित याचिका के बाद शुरू हुआ था, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर गायों के वध को रोकने की मांग की गई थी। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया था कि वे यह सुनिश्चित करें कि बकरीद या किसी भी अन्य दिन राज्य में कहीं भी गोहत्या न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने अब इस आदेश पर रोक लगाते हुए मामले में नोटिस जारी किया है और पशु वध को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनों के तहत पुरानी कानूनी स्थिति को बहाल कर दिया है।
