राष्ट्रीय

4 पीढ़ियां, 70 साल और 2 जजों की बेंच… सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया नेहरू के दौर का जमीन विवाद

4 पीढ़ियां, 70 साल और 2 जजों की बेंच… सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया नेहरू के दौर का जमीन विवाद

​नई दिल्ली: “तारीख पर तारीख” के लंबे दौर से गुजरने वाले जमीन विवादों का एक ऐसा अनोखा मामला सुप्रीम कोर्ट से सामने आया है, जिसने भारत के कूटनीतिक और कानूनी इतिहास के कई पन्ने देख लिए। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल (1956-57) में शुरू हुआ यह मुकदमा, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में आकर थमा है।

​इस केस की सबसे दिलचस्प बात यह है कि देश की जिस शीर्ष अदालत ने इसका अंतिम फैसला सुनाया, उसके दोनों माननीय जजों का इस मुकदमे की शुरुआत के समय जन्म भी नहीं हुआ था।

​7 दशक तक केस लड़ती रहीं 4 पीढ़ियां

​सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 70 वर्ष पुराने एक जटिल जमीन विवाद का निपटारा करते हुए 4 जून 1957 की एक सेल डीड (बिक्री विलेख) को पूरी तरह वैध ठहराया। इस मामले में एक ही परिवार की चार पीढ़ियां पिछले सात दशकों से अधिक समय से अदालतों के चक्कर काट रही थीं।

​न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के नरसिपुर कलां गांव स्थित 15.5 बीघा भूमि से जुड़े इस ऐतिहासिक विवाद का अंत करते हुए सराफत अली के पूर्वजों के पक्ष में फैसला सुनाया।

​क्या था 15.5 बीघा जमीन का पूरा विवाद?

​इस मुकदमे की कहानी साल 1957 से शुरू होती है:

​नाबालिगों के नाम रजिस्ट्री: 1957 में एक पंजीकृत (रजिस्टर्ड) सेल डीड के माध्यम से अपीलकर्ताओं के पूर्वजों ने (जो उस समय नाबालिग थे) हरिद्वार में 15.5 बीघा भूमि खरीदी थी। उनका दावा था कि खरीदारी के बाद से ही वे लगातार इस जमीन पर काबिज हैं।

​म्यूटेशन और चकबंदी: साल 1984 में विक्रेताओं में से एक द्वारा अपनी आपत्ति वापस लेने के बाद जमीन का म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) अपीलकर्ताओं के पक्ष में हो गया। इसके बाद 1991 में चकबंदी (Consolidation) की कार्यवाही के दौरान उन्होंने भूमिधर के रूप में अपने अधिकारों की मान्यता मांगी।

​ट्विस्ट और लोअर कोर्ट का फैसला: शुरुआत में चकबंदी अधिकारी ने उनका दावा मान लिया था, लेकिन बाद में अन्य सह-भूस्वामियों (Co-owners) की आपत्तियों के बाद केस को फिर से खोला गया। साल 1999 में चकबंदी अधिकारी ने अपीलकर्ताओं का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 154 का उल्लंघन करता है।

​इसके बाद अपीलीय प्राधिकारियों और साल 2017 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय (High Court) ने भी अपीलकर्ताओं की याचिका को खारिज कर दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

​सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

​निचली अदालतों और हाई कोर्ट के फैसलों को पलटते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

​1. मामूली विसंगतियों के आधार पर रजिस्ट्री रद्द नहीं हो सकती:

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट और चकबंदी प्राधिकारियों ने महज गवाह के पते में मामूली अंतर होने के कारण 1957 की रजिस्टर्ड सेल डीड को शून्य (Void) मानकर बहुत बड़ी कानूनी त्रुटि की थी।

​2. धोखाधड़ी या जालसाजी का कोई आरोप नहीं:

पीठ ने रेखांकित किया कि प्रतिवादियों (विपक्षी पार्टी) ने कभी भी यह दावा नहीं किया था कि यह सेल डीड जाली थी या इसे किसी दबाव, प्रतिरूपण (Impersonation) अथवा धोखाधड़ी से तैयार कराया गया था।

​3. कानूनन वैधता की धारणा:

कोर्ट ने साफ किया कि जब एक बार कोई दस्तावेज कानूनन रजिस्टर्ड हो जाता है, तो उसे प्रमाण की छोटी-मोटी कमियों के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अपीलकर्ता लगातार इस जमीन पर काबिज रहे हैं और प्रतिवादी इस दावे का खंडन करने में पूरी तरह नाकाम रहे।

​सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही आखिरकार चार पीढ़ियों से चले आ रहे इस लंबे और थका देने वाले कानूनी संघर्ष का हमेशा के लिए पटाक्षेप हो गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *