Friday, May 29, 2026
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अदालतों में फैसलों की देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: हाईकोर्ट्स के लिए 3 महीने की डेडलाइन तय, बेल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जारी कीं ऐतिहासिक गाइडलाइंस

अदालतों में फैसलों की देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: हाईकोर्ट्स के लिए 3 महीने की डेडलाइन तय, बेल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जारी कीं ऐतिहासिक गाइडलाइंस

​नई दिल्ली: देशभर की अदालतों में मुकदमों के फैसलों और आदेशों को अपलोड करने में हो रही देरी पर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर है’ और इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

​न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच (जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपिन एम. पंचोली शामिल थे) ने झारखंड हाईकोर्ट के एक मामले की सुनवाई करते हुए देश की सभी अदालतों और हाईकोर्ट्स के लिए विस्तृत व कड़े दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) जारी किए हैं। यह पूरा मामला झारखंड हाईकोर्ट के एक ऐसे फैसले से जुड़ा था, जिसे दिसंबर 2025 में सुरक्षित (रक्षित) रखने के बाद सुना तो दिया गया था, लेकिन महीनों बाद भी उसे न तो वेबसाइट पर अपलोड किया गया और न ही वकीलों को उसकी कॉपी दी गई।

​1. सुरक्षित (Reserved) फैसलों के लिए 3 महीने की समय-सीमा

​सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जजों द्वारा सुरक्षित रखे गए फैसलों को सुनाने के लिए अब एक निश्चित समय-सीमा का पालन करना अनिवार्य होगा:

​3 महीने की डेडलाइन: हाईकोर्ट में आरक्षित रखे गए फैसले सामान्यतः तीन महीने के भीतर सुनाए जाने चाहिए।

​अतिरिक्त मोहलत: यदि तीन महीने में फैसला नहीं आता है, तो संबंधित कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल इस मामले को वहां के चीफ जस्टिस (मुख्य न्यायाधीश) के सामने रखेंगे। मुख्य न्यायाधीश आवश्यकता पड़ने पर 2 हफ्ते की अतिरिक्त मोहलत दे सकते हैं।

​केस ट्रांसफर की चेतावनी: यदि अतिरिक्त समय मिलने के बाद भी फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो उस केस को सुनवाई के लिए तुरंत दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया जाएगा।

​2. जमानत (Bell) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर ‘उसी दिन’ का नियम

​व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) से जुड़े मामलों पर विशेष जोर देते हुए शीर्ष अदालत ने बेल और अंडरट्रायल (विचाराधीन) कैदियों के लिए बेहद मानवीय और त्वरित नियम तय किए हैं:

​त्वरित निर्णय: जमानत याचिकाओं (Bail Applications) पर या तो उसी दिन या फिर अगले ही दिन अनिवार्य रूप से फैसला सुनाना होगा।

​तत्काल जेल को सूचना: बेल का आदेश मंजूर होते ही उसकी कॉपी उसी दिन जेल प्रशासन को भेजना अनिवार्य होगा ताकि कागजी कार्रवाई में देरी न हो।

​तुरंत रिहाई: आदेश मिलने के बाद जेल में बंद विचाराधीन कैदी को उसी दिन या अधिकतम अगले दिन हर हाल में रिहा करना होगा।

​3. फैसलों को ऑनलाइन अपलोड करने के कड़े नियम

​अक्सर देखा जाता है कि अदालतें अपना मुख्य फैसला (ऑपरेटिव पार्ट) तो सुना देती हैं, लेकिन विस्तृत आदेश आने में हफ्तों लग जाते हैं। इस पर रोक लगाते हुए कोर्ट ने कहा:

​7 दिनों की लिमिट: अदालत में भले ही केवल फैसले का मुख्य हिस्सा पढ़ा जाए, लेकिन उसका पूरा विस्तृत आदेश (Detailed Order) 7 दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड हो जाना चाहिए।

​15 और 30 दिनों का विकल्प: यदि आदेश 15 दिनों तक अपलोड नहीं होता है, तो संबंधित पक्षकार इसके लिए आवेदन दे सकते हैं। यदि 30 दिनों के बाद भी लिखित कारण या आदेश अपलोड नहीं होता है, तो पक्षकारों के पास उस केस को दूसरी बेंच में भेजने की मांग करने का कानूनी अधिकार होगा।

​4. पारदर्शिता बढ़ाने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक सुधार

​सिस्टम को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी स्तर पर भी बदलाव के निर्देश दिए हैं:

​वेबसाइट पर दिखेगा डेटा: सभी हाईकोर्ट्स को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर यह साफ-साफ प्रदर्शित करना होगा कि किस केस का फैसला किस तारीख को सुरक्षित (Reserve) किया गया था। सभी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को अपने आईटी सिस्टम में यह बदलाव करने को कहा गया है।

​निचली अदालतों से रिपोर्ट: ट्रायल कोर्ट्स (निचली अदालतों) को अनिवार्य रूप से हाईकोर्ट को यह फीडबैक देना होगा कि ऊपरी अदालतों द्वारा दिए गए आदेशों का जमीन पर समय से पालन हुआ है या नहीं।

​सभी राज्यों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया है कि वे इन गाइडलाइंस को तुरंत अपने-अपने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखें ताकि इन्हें लागू किया जा सके।

​न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने साझा किया अपना अनुभव:

सुनवाई के दौरान बेंच की अगुवाई कर रहे जस्टिस सूर्यकांत ने अपना उदाहरण देते हुए कहा, “हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 साल के लंबे कार्यकाल के दौरान हमने कभी भी किसी भी फैसले को तीन महीने से ज्यादा समय तक लंबित नहीं रखा।” उन्होंने स्पष्ट किया कि ये निर्देश किसी जज विशेष पर टिप्पणी नहीं हैं, बल्कि पूरे न्यायिक सिस्टम में सुधार के लिए उठाए गए जरूरी कदम हैं।

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