‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…’ मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में निधन, अदब की दुनिया में शोक की लहर
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…’ मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में निधन, अदब की दुनिया में शोक की लहर
भोपाल: उर्दू अदब, गजल और शायरी की दुनिया के चमकते सितारे, प्रख्यात साहित्यकार और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में निधन हो गया। 91 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली। उनके रुखसत होने की खबर फैलते ही अदबी दुनिया (साहित्य जगत), बॉलीवुड और उनके करोड़ों प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है। सोशल मीडिया पर लोग उनके कालजयी शेरों को साझा कर नम आंखों से उन्हें शिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश कर रहे हैं।
याददाश्त छीनने वाली गंभीर बीमारी ‘डिमेंशिया’ से थे पीड़ित
पारिवारिक सूत्रों और करीबियों से मिली जानकारी के मुताबिक, डॉ. बशीर बद्र पिछले लंबे समय से ‘डिमेंशिया’ (Dementia) नामक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहे थे।
अपनों को भूल चुके थे बशीर: इस बीमारी के चलते वे अपनी याददाश्त पूरी तरह खो चुके थे। जीवन के आखिरी दौर में वे अपने बेहद करीबी लोगों और रिश्तेदारों को भी पहचान पाने की स्थिति में नहीं थे।
उम्र जनित बीमारियां: बढ़ती उम्र के कारण उन्हें सांस लेने और अन्य शारीरिक परेशानियां भी लगातार घेर रही थीं, जिसके चलते गुरुवार को उनका पार्थिव शरीर शांत हो गया। परिजनों के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार भोपाल में ही किया जाएगा।
महज 7 साल की उम्र से शुरू किया था शायरी का सफर
15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले में जन्मे डॉ. बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बद्र था। उन्हें शेर-ओ-शायरी का हुनर विरासत और कुदरत दोनों से मिला था।
AMU से नाता: अदब के गलियारों में कहा जाता है कि उन्होंने महज 7 साल की कोमल उम्र में अपना पहला शेर लिखा था। उन्होंने प्रतिष्ठित अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से बीए, एमए और उर्दू साहित्य में पीएचडी (PhD) की उपाधि हासिल की। बाद में उन्होंने इसी विश्वविद्यालय में बतौर लेक्चरर (प्रोफेसर) नई पीढ़ी को उर्दू का पाठ भी पढ़ाया।
आम आदमी की भाषा में घोली ‘मोहब्बत की मिठास’
डॉ. बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू शायरी को क्लिष्ट (कठिन) शब्दों के चंगुल से निकालकर आम बोलचाल की भाषा ‘हिंदुस्तानी’ से जोड़ा। उनकी गजलों में मोहब्बत, तन्हाई, टूटते रिश्ते, इंसानी दर्द और जिंदगी का फलसफा बेहद सादगी के साथ झलकता था। उनके लिखे कई शेर आज भी दुनिया भर के लोगों की जुबान पर हर रोज आते हैं:
”कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
”उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
”लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
1987 का मेरठ दंगा: जब खाक हो गया था बशीर का ‘आशियाना’
डॉ. बशीर बद्र की जिंदगी का सबसे काला और दर्दनाक पन्ना साल 1987 में सामने आया। उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुए भयंकर दंगों की आग में दंगाइयों ने बशीर साहब का घर फूंक दिया था। इस अग्निकांड में केवल उनका मकान नहीं जला, बल्कि उनकी बरसों की मेहनत, अनमोल किताबें, निजी डायरियां और सैकड़ों ऐसी गजलें व नज्में जलकर राख हो गईं जो कहीं प्रकाशित भी नहीं हुई थीं।
इस हादसे ने संवेदनशील शायर को भीतर तक झकझोर दिया था, जिसके बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और हमेशा के लिए भोपाल आकर बस गए।
पद्मश्री सहित कई सम्मानों से हुए विभूषित:
उर्दू गजल को नए आयाम देने और देश-दुनिया में भारत का नाम रोशन करने के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा था। इसके अलावा उन्हें उर्दू साहित्य का सर्वोच्च ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ भी मिला। आज बशीर बद्र साहब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी मखमली गजलें और यादों के उजाले हमेशा अदब की दुनिया को रोशन करते रहेंगे।
