उत्तराखंड में वनाग्नि की घटनाओं में कमी: जानिए क्या रही वन विभाग की रणनीति और ‘जन सहभागिता’ मॉडल
उत्तराखंड में वनाग्नि की घटनाओं में कमी: जानिए क्या रही वन विभाग की रणनीति और ‘जन सहभागिता’ मॉडल
देहरादून: उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के पीक सीजन के बीच जंगलों की आग (फायर सीजन) वन विभाग के लिए हमेशा से एक बहुत बड़ी चुनौती रही है। बढ़ते वैश्विक तापमान, लंबे सूखे और अल-नीनो के प्रभाव के कारण इस साल भी वनाग्नि का खतरा मंडरा रहा था, लेकिन राहत की बात यह है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल वनाग्नि की घटनाओं और उससे होने वाले नुकसान में भारी कमी देखी गई है।
लगातार बढ़ते तापमान और आगामी ‘ड्राई स्पेल’ (dry spell) की आशंकाओं के बीच वन विभाग ने इस बार पारंपरिक तरीकों से हटकर कुछ नए और कड़े नीतिगत फैसले लिए, जिसके सकारात्मक परिणाम जमीन पर दिखने लगे हैं।
इस सीजन के अब तक के आंकड़े (15 फरवरी से 25 मई 2026)
उत्तराखंड वन विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल फायर सीजन की शुरुआत से लेकर अब तक प्रदेश की स्थिति इस प्रकार है:
कुल घटनाएं: प्रदेश भर में वनाग्नि की कुल 394 घटनाएं दर्ज की गई हैं।
प्रभावित वन भूमि: इन घटनाओं के कारण 331.12 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित हुई है।
जान-माल का नुकसान: आग की चपेट में आने से दुर्भाग्यवश एक व्यक्ति की मौत हुई है।
क्षेत्रवार (Region-wise) विवरण:
गढ़वाल मंडल: सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा, जहां 285 घटनाएं हुईं और 241.32 हेक्टेयर वन भूमि झुलस गई।
कुमाऊं मंडल: यहां कुल 74 घटनाएं सामने आईं, जिससे 64.05 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए।
वाइल्ड लाइफ रीजन (वन्यजीव क्षेत्र): इस क्षेत्र में 35 घटनाएं दर्ज की गईं, जिससे 25.75 हेक्टेयर वन भूमि को नुकसान पहुंचा।
चुनौती अभी बाकी है: उत्तराखंड में 15 जून तक आधिकारिक फॉरेस्ट फायर सीजन माना जाता है। ऐसे में सीजन के खत्म होने में अभी करीब 20 दिनों का समय शेष है। लगातार बढ़ते पारे को देखते हुए वन विभाग अगले तीन हफ्तों के लिए हाई अलर्ट पर है।
नुकसान कम होने के पीछे क्या रही रणनीति?
वन मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार, इस साल जंगलों को आग से बचाने के लिए सरकार ने ‘कम्युनिटी पार्टिसिपेशन’ (जन सहभागिता) को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है। सरकार ने पिछले 4 वर्षों में जनता के अनुकूल (People-Friendly) 12 से अधिक नीतियां बनाई हैं, जिससे वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष (Wildlife Conflict) दोनों में कमी आई है।
जंगलों की आग पर लगाम लगाने के लिए निम्नलिखित मुख्य प्लानिंग्स पर काम किया गया:
फायर वॉचर्स की बड़ी फौज: वनाग्नि की त्वरित सूचना और रोकथाम के लिए नियमित वन कर्मियों के साथ-साथ 5,625 फायर वॉचर्स को मैदान में उतारा गया है।
ग्राम प्रधानों को कमान और प्रोत्साहन: राज्य के सबसे संवेदनशील माने जाने वाले 450 क्षेत्रों में ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में ‘फॉरेस्ट फायर मैनेजमेंट कमेटी’ का गठन किया गया है। इन कमेटियों को बेहतर प्रबंधन के लिए ₹30,000 प्रति समिति की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।
उच्चाधिकारियों की सीधी तैनाती: वन विभाग के इतिहास में पहली बार पीसीसीएफ (PCCF) रैंक के शीर्ष अधिकारियों को सीधे जनपदों में नोडल अधिकारी के रूप में तैनात किया गया है, ताकि वे मौके पर रहकर स्थिति की निगरानी कर सकें।
फायर वॉचर्स का ₹10 लाख का बीमा: अग्रिम पंक्ति में जान जोखिम में डालकर काम करने वाले फायर वॉचर्स का सामूहिक दुर्घटना बीमा कवर बढ़ाकर 10 लाख रुपये प्रति व्यक्ति कर दिया गया है, जिससे उनका मनोबल बढ़ा है।
’फायर लाइन’ के रूप में इस्तेमाल होंगी सड़कें
उत्तराखंड में कुल फायर लाइन की लंबाई 13,085.03 किलोमीटर है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में ‘रिस्पांस टाइम’ (आग की सूचना मिलने और मौके पर पहुंचने के बीच का समय) को कम करना एक बड़ी चुनौती है।
इसी को देखते हुए वन विभाग ने इस बार एक बड़ा नीतिगत निर्णय लिया है। अब प्रदेश भर में मौजूदा सड़कों को ही ‘फायर लाइन’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका दोहरा फायदा हो रहा है— एक तो सड़कों के माध्यम से आग को एक हिस्से से दूसरे हिस्से में फैलने से रोकने में तुरंत मदद मिल रही है, और दूसरा, नई कृत्रिम फायर लाइन बनाने के लिए जंगलों में पेड़ों के कटान पर भी पूरी तरह रोक लग गई है।
