तालिबान का नया मैरिज कानून: छोटी बच्चियों की शादी को हरी झंडी! संयुक्त राष्ट्र ने जताई गंभीर चिंता, जानें इस विवादित कानून की बड़ी बातें
तालिबान का नया मैरिज कानून: छोटी बच्चियों की शादी को हरी झंडी! संयुक्त राष्ट्र ने जताई गंभीर चिंता, जानें इस विवादित कानून की बड़ी बातें
काबुल / न्यूयॉर्क: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार अपने एक और नए और बेहद विवादित फरमान को लेकर पूरी दुनिया के निशाने पर आ गई है। तालिबान प्रशासन ने देश में ‘मैरिज लॉ’ (शादी संबंधी कानून) को लेकर एक नया आदेश पास किया है, जिसे लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने “गंभीर चिंता” व्यक्त की है।
इस नए कानून के सामने आने के बाद वैश्विक स्तर पर आरोप लग रहे हैं कि तालिबान ने इसके जरिए परोक्ष रूप से बाल विवाह (जबरन शादी) को कानूनी मान्यता दे दी है। इसके साथ ही, इस कानून में ऐसी व्यवस्थाएं की गई हैं जिससे मासूम बच्चियों और महिलाओं की मर्जी पूरी तरह खत्म हो जाएगी और उनके जीवन के फैसले केवल पिता, दादा या पति ही तय करेंगे।
संयुक्त राष्ट्र ने कहा— ‘भेदभाव और मजबूत होगा’, तालिबान ने आरोपों को नकारा
अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) ने इस कानून पर कड़ी आपत्ति जताते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया है।
यूएन की चिंता: संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इस कानून में बाल विवाह से जुड़े कई प्रतिगामी प्रावधान शामिल हैं, जो महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ पहले से चले आ रहे भेदभाव को और ज्यादा मजबूत करेंगे। यह कानून पूरी और स्वतंत्र सहमति के सिद्धांत को कमजोर करता है और बच्चों के हितों की सुरक्षा करने में पूरी तरह नाकाम रहता है।
तालिबान का तर्क: अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी एपी (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान सरकार ने दुनिया भर में हो रही थू-थू के बीच इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। तालिबानी प्रशासन का दावा है कि यह नया आदेश पूरी तरह से इस्लामी (शरिया) कानून के अनुसार है और देश में लड़कियों की जबरन शादी पर पहले से ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है।
आखिर क्या है इस विवादित कानून में?
अफगानिस्तान के न्याय मंत्रालय ने पिछले हफ्ते ‘डिक्री नंबर 18’ (Decree No. 18) जारी की है, जिसका नाम “पति-पत्नी के न्यायिक अलगाव” रखा गया है। इस डिक्री में शादीशुदा जोड़ों के अलग होने और विवाह से जुड़े कई नियम तय किए गए हैं, जिनमें से सबसे विवादित प्रावधान इस प्रकार हैं:
चुप्पी ही मंजूरी: सबसे हैरान करने वाले नियम के मुताबिक, यदि कोई लड़की युवावस्था (प्यूबर्टी) में पहुंच चुकी है, तो शादी के समय उसकी ‘चुप्पी’ को ही उसकी तरफ से विवाह के लिए ‘मंजूरी’ मान लिया जाएगा।
नाबालिगों के तलाक का जिक्र: यूएनएएमए (UNAMA) ने ध्यान दिलाया कि इस कानून में बाकायदा उन लड़कियों के तलाक का भी जिक्र किया गया है जो अब युवावस्था में पहुंच चुकी हैं और पहले से ही शादीशुदा हैं। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि तालिबान ने बचपन में होने वाली शादियों को कानूनी दर्जा दे दिया है।
शादी रद्द करने की कठिन शर्तें: आदेश में कहा गया है कि अगर किसी पिता या दादा ने किसी नाबालिग लड़की या लड़के की शादी बिना दहेज, बहुत कम दहेज या गलत तरीके से की है, तो उसे अमान्य घोषित किया जा सकता है। इसके अलावा, अगर किसी लड़की की शादी उसके पिता/दादा ने किसी ऐसे व्यक्ति से कर दी है जो उसके साथ दुर्व्यवहार करता है या अपने बुरे फैसलों के लिए बदनाम है, तो लड़की युवावस्था में पहुंचने के बाद कोर्ट जाकर शादी रद्द कराने की मांग कर सकती है।
पति का पलड़ा भारी: इस कानून का सबसे बड़ा पेच यह है कि अगर कोई लड़की अपने पति से तलाक मांगती है और पति इसके लिए इनकार कर देता है, तो नई व्यवस्था के मुताबिक पति की बात को ही सही माना जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि लड़की के पास अपनी बात साबित करने के लिए गवाह नहीं होंगे। हालांकि, अगर लड़की सीधे जज के सामने अपनी मांग रखती है, तो उसे गवाहों की जरूरत नहीं होगी।
अफगानिस्तान में महिलाओं की बदतर स्थिति
तालिबान के सत्ता में आने के बाद से ही अफगानिस्तान में महिलाएं और लड़कियां बड़े पैमाने पर संस्थागत भेदभाव का सामना कर रही हैं। यह नया कानून उनकी स्थिति को और बदतर बना देगा।
वर्तमान में वहां महिलाओं के लिए कई सख्त पाबंदियां लागू हैं:
महिलाओं के पहनावे और सामाजिक व्यवहार को लेकर बेहद कड़े कानून तय किए गए हैं।
छठी कक्षा से ऊपर की लड़कियों के लिए स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दरवाजे पूरी तरह बंद हैं।
महिलाओं को ज्यादातर नौकरियों और कार्यक्षेत्रों से पूरी तरह प्रतिबंधित (बैन) किया जा चुका है।
महिलाओं और बच्चियों को जिम, ब्यूटी सैलून और यहाँ तक कि सार्वजनिक पार्कों जैसी बुनियादी मनोरंजन गतिविधियों में जाने की भी सख्त मनाही है।
