उत्तराखंड

उत्तराखंड के जंगलों में हाहाकार: 93 दिनों में 240 हेक्टेयर वन क्षेत्र राख, अगले 7 दिन और बढ़ सकती है आफत

उत्तराखंड के जंगलों में हाहाकार: 93 दिनों में 240 हेक्टेयर वन क्षेत्र राख, अगले 7 दिन और बढ़ सकती है आफत

​देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ों में बढ़ती गर्मी और लंबे समय से बारिश न होने के कारण ‘दावानल’ (जंगल की आग) ने विकराल रूप धारण कर लिया है। पिछले 93 दिनों के भीतर प्रदेश में वनाग्नि की 295 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें 239.47 हेक्टेयर जंगल जलकर खाक हो चुका है। आग की सबसे ज्यादा मार उत्तराखंड के गढ़वाल रीजन पर पड़ी है।

​चिंता की बात यह है कि मौसम विभाग (IMD) ने अगले एक हफ्ते तक राज्य में बारिश न होने की आशंका जताई है, जिससे जंगलों में लगी आग और भड़क सकती है।

​मौसम विभाग का अलर्ट: 3 डिग्री तक बढ़ेगा पारा

​उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक रोहित थपलियाल के अनुसार, वर्तमान में तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री ऊपर चल रहा है। अगले 7 दिनों तक बारिश की कोई उम्मीद नहीं है, जिससे मैदानी और पहाड़ी इलाकों में गर्मी और बढ़ेगी और पारा 3 डिग्री तक और चढ़ सकता है।

​राहत की मामूली उम्मीद: आगामी 20 से 22 मई के बीच पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं-कहीं हल्की बूंदाबांदी हो सकती है, लेकिन मैदानी इलाकों में शुष्क मौसम और चिलचिलाती धूप के कारण वनाग्नि की घटनाएं बढ़ने का खतरा और प्रबल हो गया है। हवा में नमी (ह्यूमिडिटी) न के बराबर होने से सूखी पत्तियां बारूद का काम कर रही हैं।

​आखिर क्यों सुलग रहे हैं देवभूमि के जंगल?

​उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने के पीछे प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारण जिम्मेदार हैं:

​चीड़ के जंगल (पाइन ट्री): उत्तराखंड में सबसे ज्यादा आग चीड़ के वनों में लगती है। चीड़ के पेड़ों से झड़ने वाली पत्तियां (पिरुल) और उससे निकलने वाला ‘लीसा’ (Resin) अत्यधिक ज्वलनशील होता है, जो मामूली चिंगारी से भी धधक उठता है।

​मानवीय लापरवाही व साजिश: कई जगहों पर स्थानीय लोग नई और अच्छी घास उगने के लालच में जानबूझकर जंगलों में आग लगा देते हैं, जो बाद में बेकाबू हो जाती है। इसके अलावा जंगलों से गुजरने वाले राहगीरों द्वारा जलती हुई बीड़ी-सिगरेट फेंकना भी मुख्य वजह है।

​जलवायु परिवर्तन (Climate Change): समय पर बारिश और बर्फबारी न होने से जमीन का तापमान बढ़ रहा है और जंगलों की प्राकृतिक नमी खत्म हो चुकी है।

​प्राकृतिक कारण: वन्यजीवों के मूवमेंट के कारण पहाड़ों से गिरने वाले पत्थरों के आपसी घर्षण से पैदा होने वाली चिंगारी भी कभी-कभी आग का कारण बनती है।

​वन विभाग की रणनीति: रिहायशी इलाकों को बचाना पहली प्राथमिकता

​उत्तराखंड फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के मुख्य वन संरक्षक और आपदा प्रबंधन के नोडल अधिकारी सुशांत पटनायक ने बताया कि विभाग की पूरी टीम 24 घंटे आग पर काबू पाने की कोशिश कर रही है। वन विभाग का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य जंगलों की आग को इंसानी बस्तियों और रिहायशी इलाकों से दूर रखना है ताकि जान-माल का नुकसान न हो।

​आग से निपटने के लिए सरकारी इंतजाम:

​1,438 फॉरेस्ट फायर स्टेशन सक्रिय किए गए हैं।

​40 मास्टर फायर कंट्रोल रूम चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं।

​5,600 फॉरेस्ट फायर वॉलेंटियर्स की टीम धरातल पर आग बुझाने में जुटी हुई है।

​इसके बावजूद, लगातार बढ़ते तापमान और सूखे ने वन कर्मियों की चुनौती को दोगुना कर दिया है। यदि अगले कुछ दिनों में मौसम ने करवट नहीं ली, तो पर्यावरण और वन्यजीवों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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