डिजिटल महामारी: क्या स्मार्टफोन सच में दुनिया की आबादी खत्म कर रहा है?
यह सोचना थोड़ा अजीब लग सकता है कि जेब में रहने वाला एक छोटा सा डिवाइस पूरी दुनिया की आबादी को प्रभावित कर सकता है, लेकिन हाल ही में आए कुछ वैश्विक शोध और यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी (University of Cincinnati) के अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट्स ने इस बहस को दोबारा हवा दे दी है।
सीधा जवाब यह है कि स्मार्टफोन सीधे तौर पर किसी की जान लेकर आबादी खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि यह इंसानी व्यवहार और प्राथमिकताओं को बदलकर “ग्लोबल बर्थ रेट” (वैश्विक जन्म दर) को तेजी से गिरा रहा है।
इसे विज्ञान और समाजशास्त्र की भाषा में इस तरह समझा जा सकता है:
1. ‘इन-पर्सन’ सोशलाइजेशन की जगह ‘डिजिटल लीजर’
शोधकर्ताओं (जैसे अर्थशास्त्री नाथन हडसन और हरमन मॉस्कोसो बोएडो) के अनुसार, साल 2007 (जब पहला आईफोन लॉन्च हुआ) और उसके बाद 4G नेटवर्क के आने के बाद से दुनिया भर के युवाओं के लाइफस्टाइल में बहुत बड़ा बदलाव आया है।
पहले लोग दोस्तों और पार्टनर से मिलने के लिए बाहर जाते थे (In-person socialization)।
अब उसकी जगह रील्स देखना, गेमिंग और सोशल मीडिया (Digital Leisure) ने ले ली है। लोग आपस में शारीरिक रूप से कम मिल रहे हैं, जिससे नए रिश्ते बनने या शादियां होने की दर में कमी आई है।
2. पार्टनर्स को ढूंढना हुआ मुश्किल
डेमोग्राफर्स (जनसंख्या विशेषज्ञ) का कहना है कि एक सही जीवनसाथी चुनने के लिए इंसान को असल जिंदगी में कई लोगों से मिलना-जुलना पड़ता है। चूंकि स्मार्टफोन के कारण वास्तविक सामाजिक दायरा (Social interaction) सिकुड़ गया है, इसलिए लोगों को अपना पार्टनर ढूंढने में पहले से ज्यादा वक्त लग रहा है, या कई लोग अकेले रहना ही पसंद कर रहे हैं।
3. डेटा में दिखी इसकी साफ टाइमलाइन
फाइनेंशियल टाइम्स (Financial Times) में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन देशों में हाई-स्पीड मोबाइल इंटरनेट और स्मार्टफोन पहले पहुंचे, वहां जन्म दर में सबसे पहले और सबसे तेज गिरावट देखी गई:
अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया: साल 2007 के बाद से युवाओं और किशोरों की फर्टिलिटी रेट में तेज गिरावट आई। (अमेरिका में 2007 के बाद से टीन फर्टिलिटी करीब 71% तक गिरी है)।
फ्रांस और पोलैंड: यहां यह बदलाव साल 2009 के आसपास दिखा।
मैक्सिको, मोरक्को और इंडोनेशिया: यहां 2012 के बाद यह असर दिखने लगा।
अफ्रीकी देश (जैसे घाना, नाइजीरिया): यहां 2013 से 2015 के बीच जन्म दर में गिरावट दर्ज की गई, जो बिल्कुल उसी समय के साथ मेल खाती है जब वहां स्मार्टफोन की बिक्री तेजी से बढ़ी थी।
क्या सिर्फ स्मार्टफोन ही जिम्मेदार है?
नहीं, स्मार्टफोन इकलौता कारण नहीं है। दुनिया की आबादी के रिप्लेसमेंट लेवल (2.1 बच्चे प्रति महिला) से नीचे जाने के पीछे कई अन्य बड़े कारण भी हैं:
बढ़ती महंगाई और बच्चों की परवरिश का खर्च: आजकल बच्चों की पढ़ाई और रहन-सहन का खर्च बहुत बढ़ गया है।
आर्थिक अस्थिरता और करियर: युवा अब पहले करियर सेट करने को प्राथमिकता देते हैं, जिससे शादियां और बच्चे देर से होते हैं।
बदलता नजरिया: अब लोग अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानसिक शांति को ज्यादा महत्व देने लगे हैं।
निष्कर्ष: स्मार्टफोन को एक “साइलेंट पॉपुलेशन थ्रेट” (जनसंख्या के लिए मूक खतरा) माना जा रहा है क्योंकि यह इंसानों के बीच की वास्तविक नजदीकी को खत्म कर उन्हें स्क्रीन्स से बांध रहा है। वैज्ञानिक भाषा में कहें तो स्मार्टफोन जैविक रूप से इंसानों को खत्म नहीं कर रहा, बल्कि सामाजिक रूप से हमें इतना व्यस्त और अकेला बना रहा है कि नई पीढ़ी का आना धीमा हो गया है।
