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सबरीमाला रेफरेंस केस में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी की, फैसला रखा सुरक्षित; समझिए आखिर क्या था पूरा विवाद

सबरीमाला रेफरेंस केस में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी की, फैसला रखा सुरक्षित; समझिए आखिर क्या था पूरा विवाद

नई दिल्ली: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने है। 13 मई 2026 को 15वें दिन सुनवाई पूरी हुई और कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। इस फैसले का असर सिर्फ सबरीमाला तक नहीं, बल्कि देशभर के धार्मिक स्थलों, धार्मिक प्रथाओं और महिलाओं के अधिकारों पर व्यापक रूप से पड़ेगा।

क्या है पूरा विवाद?

सबरीमाला मंदिर (केरल) में भगवान अयप्पा को “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” माना जाता है। परंपरा के अनुसार, 10 से 50 वर्ष की महिलाओं (मासिक धर्म वाली उम्र) को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इस प्रथा को चुनौती देते हुए 2006 में Indian Young Lawyers Association ने PIL दायर की।

2018 का फैसला:

28 सितंबर 2018 को 5 जजों की संवैधानिक पीठ (4:1) ने फैसला सुनाया कि यह प्रथा असंवैधानिक है। कोर्ट ने कहा:

यह लिंग के आधार पर भेदभाव है (अनुच्छेद 14, 15)।

महिलाओं का मंदिर में प्रवेश का अधिकार (अनुच्छेद 25) इससे प्रभावित होता है।

अयप्पा भक्त कोई अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं हैं।

“Essential Religious Practice” (ERP) टेस्ट में यह प्रथा फेल है।

इस फैसले के बाद केरल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। कई महिलाओं को मंदिर जाने से रोका गया और हिंसा भी हुई।

रिव्यू और रेफरेंस

2019 में रिव्यू पिटीशन दायर की गईं। 5 जजों की बेंच ने 3:2 से फैसला किया कि 2018 का फैसला सही है या नहीं, यह तय करने से पहले कुछ बड़े संवैधानिक सवालों को 7 या उससे बड़े बेंच को रेफर किया जाए।

मुख्य सवाल (7 महत्वपूर्ण प्रश्न):

अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है?

“Essential Religious Practice” (ERP) डॉक्ट्रिन को कैसे परिभाषित किया जाए?

कोर्ट धार्मिक प्रथाओं में सुधार कर सकता है या नहीं?

महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है या संप्रदाय का अधिकार?

अन्य धार्मिक प्रथाओं (जैसे दाऊदी बोहरा में FGM आदि) पर क्या असर पड़ेगा?

अप्रैल 2026 से 9 जजों की पीठ (CJI सूर्य कांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना और अन्य) ने सुनवाई शुरू की। 15 दिनों तक विस्तृत बहस हुई।

दोनों पक्षों की दलीलें

समर्थकों की दलील: महिलाओं के खिलाफ भेदभाव असंवैधानिक है। मंदिर सार्वजनिक स्थान है, धार्मिक प्रथा संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।

विरोधियों की दलील (मंदिर पक्ष, केंद्र सरकार आदि): यह धार्मिक विश्वास और परंपरा का मुद्दा है। कोर्ट को धार्मिक भावनाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अनुच्छेद 26 के तहत संप्रदाय को अपने मामलों को प्रबंधित करने का अधिकार है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह केस?

इस फैसले से न सिर्फ सबरीमाला, बल्कि कई अन्य मंदिरों, मस्जिदों और धार्मिक प्रथाओं (जैसे महिलाओं के मंदिर प्रवेश, कुछ रीति-रिवाज आदि) पर असर पड़ेगा। यह “Essential Religious Practice” टेस्ट की सीमाओं, राज्य के हस्तक्षेप और व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामूहिक धार्मिक अधिकार पर बड़ा फैसला तय करेगा।

अब क्या?

9 जजों की पीठ का फैसला आने के बाद रिव्यू पिटीशन पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। फैसला कब आएगा, इसकी कोई निश्चित तारीख नहीं है, लेकिन इसे संवैधानिक इतिहास का अहम फैसला माना जा रहा है।

देशभर में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और न्यायपालिका की भूमिका पर इस फैसले की चर्चा लंबे समय तक चलेगी।

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