उत्तराखंड: मदरसा बोर्ड भंग होने के बाद ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ की तैयारी, अब धार्मिक शिक्षा के साथ पढ़ाया जाएगा देवभूमि का इतिहास
उत्तराखंड: मदरसा बोर्ड भंग होने के बाद ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ की तैयारी, अब धार्मिक शिक्षा के साथ पढ़ाया जाएगा देवभूमि का इतिहास
देहरादून | राज्य ब्यूरो: उत्तराखंड की धामी सरकार प्रदेश के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों और मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करने जा रही है। मदरसा बोर्ड को भंग करने के बाद अब सरकार ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ के गठन को अंतिम रूप दे रही है। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य संस्थानों में पारदर्शिता लाना, अनियमितताओं को रोकना और छात्रों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ राज्य की संस्कृति से परिचित कराना है।
मई में सिलेबस और जून से रजिस्ट्रेशन: मिशन मोड में विभाग
अल्पसंख्यक कल्याण विभाग जुलाई से नई व्यवस्था लागू करने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। इसके लिए विभाग ने दो प्रमुख मोर्चों पर तैयारी तेज कर दी है:
धार्मिक शिक्षा का नया सिलेबस: मदरसों में अब केवल पारंपरिक धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। नए पाठ्यक्रम में उत्तराखंड के इतिहास, यहाँ की समृद्ध संस्कृति और विरासत को भी शामिल किया जा रहा है।
पंजीकरण प्रक्रिया (Registration): जून महीने से प्रदेशभर के सभी मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए नए नियमों के तहत रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया जाएगा।
क्यों पड़ी नई व्यवस्था की जरूरत?
पिछले कुछ समय में प्रदेश के कई मदरसों में गंभीर अनियमितताएं पाई गई थीं:
बिना मानक के संचालन: कई संस्थान मूलभूत सुविधाओं और मानकों के बिना चल रहे थे।
छात्र संख्या में फर्जीवाड़ा: सरकारी सहायता लेने के लिए छात्र संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के आरोप लगे।
आर्थिक अपारदर्शिता: सरकारी अनुदान (Grants) के सही उपयोग को लेकर पारदर्शिता का अभाव दिखा।
प्राधिकरण के गठन से क्या बदलेगा?
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनने के बाद संस्थानों के लिए कड़े नियम लागू होंगे:
शिक्षकों की नियुक्ति: अब शिक्षकों की भर्ती के लिए स्पष्ट मानक और प्रक्रिया तय की जाएगी।
आधुनिक शिक्षा पर जोर: धार्मिक विषयों के साथ-साथ विज्ञान, गणित और अन्य आधुनिक विषयों को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाएगा।
जवाबदेही: संस्थानों के संचालन और आर्थिक ढांचे की निगरानी सीधे प्राधिकरण करेगा।
अधिकारी का पक्ष
“धार्मिक शिक्षा के सिलेबस पर काम लगभग पूरा हो चुका है। हमारा उद्देश्य पारदर्शिता लाना है। जून से रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी ताकि जुलाई से शैक्षणिक सत्र नई व्यवस्था के तहत शुरू हो सके।”
— पराग मधुकर धकाते, विशेष सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग
चुनौतियां और विरोध के स्वर
सरकार के इस कदम का कुछ पारंपरिक संस्थानों द्वारा विरोध भी किया जा रहा है। दशकों से पारंपरिक ढांचे में चल रहे मदरसों के लिए रातों-रात नए नियमों और सिलेबस को अपनाना एक बड़ी चुनौती है। सरकार फिलहाल विभिन्न संगठनों के साथ बैठकें कर सुझाव ले रही है, लेकिन विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि नियमों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
निष्कर्ष: उत्तराखंड सरकार का यह कदम अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को ‘एक हाथ में कुरान और एक हाथ में कंप्यूटर’ देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि जून में शुरू होने वाली रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में संस्थान कितनी सक्रियता दिखाते हैं और यह नई व्यवस्था धरातल पर कितनी प्रभावी साबित होती है।
