उत्तराखंड

​उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: भाजपा और कांग्रेस ने शुरू की सर्वे की जंग, 60 और 50 सीटों के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरीं दोनों पार्टियां

उत्तराखंड में साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। प्रदेश की दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस, सत्ता के इस महासंग्राम को जीतने के लिए पूरी तरह सक्रिय मोड में आ गई हैं। इस चुनावी जंग के लिए रणनीतियां बनाने और जनता की नब्ज टटोलने के लिए सर्वे का सहारा लिया जा रहा है। यहाँ इस पर आधारित विस्तृत रिपोर्ट दी गई है:

​उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: भाजपा और कांग्रेस ने शुरू की सर्वे की जंग, 60 और 50 सीटों के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरीं दोनों पार्टियां

​देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में आगामी साल 2027 का चुनाव बेहद दिलचस्प होने जा रहा है। जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रदेश में पहली बार जीत की ‘हैट्रिक’ लगाकर नया इतिहास रचने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस पिछले 10 सालों के ‘वनवास’ को खत्म कर सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही है। दोनों ही दल अब सर्वे और जमीनी आकलन के जरिए अपनी जीत का रोडमैप तैयार कर रहे हैं।

​भाजपा की रणनीति: ’60 पार’ का लक्ष्य और दो राउंड का सर्वे

​पश्चिम बंगाल और असम में हालिया प्रदर्शन से उत्साहित भाजपा उत्तराखंड में काफी आक्रामक नजर आ रही है। पार्टी ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अपने कार्यों और साख का आकलन शुरू कर दिया है।

​दो दौर का सर्वे संपन्न: भाजपा अब तक प्रदेश में दो दौर के सर्वे पूरे कर चुकी है। इसका मुख्य उद्देश्य सिटिंग विधायकों की लोकप्रियता और जनता के बीच उनकी साख का पता लगाना है।

​कमियों पर फोकस: भाजपा प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर चौहान के अनुसार, सर्वे के जरिए उन सीटों के लिए अलग रणनीति बनाई जा रही है जहाँ भाजपा 2022 में हार गई थी या जहाँ पार्टी कभी नहीं जीती है।

​लक्ष्य: पार्टी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में 60 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

​कांग्रेस की तैयारी: 15 जून के बाद ‘एक्शन’ और 50 सीटों का टारगेट

​पिछले दो चुनावों में हार झेलने वाली कांग्रेस इस बार किसी भी तरह की चूक नहीं करना चाहती। पार्टी अब ‘कैटेगरी वाइज’ सीटों का विश्लेषण कर रही है।

​गुप्त सर्वे का सहारा: कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना के मुताबिक, पार्टी आलाकमान अपने स्तर पर गुप्त सर्वे कराता है, ताकि बिना किसी पक्षपात के जमीनी हकीकत का पता चल सके।

​रणनीति के तीन स्तर: कांग्रेस उन सीटों पर विशेष ध्यान दे रही है जहाँ वह बहुत कम अंतर से हारी थी। 15 जून को प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा के दौरे के बाद पार्टी चुनावी मोड में पूरी तरह सक्रिय हो जाएगी।

​लक्ष्य: कांग्रेस का लक्ष्य इस बार 50 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना है।

​सर्वे क्यों है जरूरी?

​किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव से पहले का यह वर्ष ‘तैयारी का वर्ष’ होता है। सर्वे के माध्यम से पार्टियां निम्नलिखित बिंदुओं पर काम कर रही हैं:

​उम्मीदवारों का चयन: क्या वर्तमान विधायक दोबारा जीतने की क्षमता रखते हैं या नए चेहरों को मौका दिया जाना चाहिए?

​सरकारी योजनाओं का प्रभाव: जनता तक सरकारी योजनाओं का लाभ कितना पहुँचा है और इसका श्रेय किसे मिल रहा है?

​संगठनात्मक मजबूती: बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता कितनी है?

​मौजूदा राजनीतिक माहौल

​वर्तमान में भाजपा का दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर और कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा का दौरा यह दर्शाता है कि दोनों दल अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा जहाँ अपनी उपलब्धियों के दम पर हैट्रिक की उम्मीद कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर और जनमुद्दों को उठाकर वापसी का दावा कर रही है।

​निष्कर्ष: साल 2027 की चुनावी लड़ाई ‘नाक और साख’ का सवाल बन चुकी है। भाजपा के लिए यह अपने वर्चस्व को बनाए रखने की चुनौती है, तो कांग्रेस के लिए अपना अस्तित्व फिर से स्थापित करने का अवसर। सर्वे की ये रिपोर्टें आने वाले महीनों में टिकट बंटवारे और चुनावी घोषणापत्रों की दिशा तय करेंगी।

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