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​केदारनाथ पैदल मार्ग पर मंडरा रहा एवलांच का खतरा: वैज्ञानिकों ने लिंचोली से रुद्र पॉइंट तक के क्षेत्र को बताया ‘डेथ जोन’

केदारनाथ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा अपडेट सामने आया है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने अपनी हालिया रिसर्च में पैदल मार्ग के एक खास हिस्से को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। यहाँ पूरी रिपोर्ट दी गई है:

​केदारनाथ पैदल मार्ग पर मंडरा रहा एवलांच का खतरा: वैज्ञानिकों ने लिंचोली से रुद्र पॉइंट तक के क्षेत्र को बताया ‘डेथ जोन’

​देहरादून: बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए पैदल मार्ग का एक बड़ा हिस्सा जोखिम भरा साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों की ताजा रिसर्च के अनुसार, लिंचोली से रुद्र पॉइंट के बीच का लगभग 4 से 5 किलोमीटर का इलाका एवलांच (हिमस्खलन) की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है।

​लिंचोली-रुद्र पॉइंट मार्ग क्यों है खतरनाक?

​वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस छोटे से हिस्से में खतरों का जाल बिछा हुआ है:

​11 एक्टिव एवलांच सूट: लिंचोली के पास 4 किलोमीटर के दायरे में 11 ऐसे पॉइंट हैं जहाँ हिमस्खलन सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं।

​विशालकाय बोल्डर: इन एवलांच के साथ बड़े-बड़े पत्थर (बोल्डर) भी नीचे गिरते हैं, जो यात्रियों के लिए जानलेवा हो सकते हैं।

​भविष्य का जोखिम: अनुमान है कि पीक सीजन के दौरान हर मिनट करीब 100 से 200 तीर्थयात्री इन खतरनाक क्षेत्रों से गुजरते हैं।

​पुराने और नए मार्ग का अंतर: क्यों बढ़ा जोखिम?

​साल 2013 की त्रासदी के बाद पुराने मार्ग के तबाह होने पर वर्तमान दक्षिण मुखी मार्ग बनाया गया था। वैज्ञानिकों ने इन दोनों मार्गों के बीच मुख्य अंतर स्पष्ट किया है:

​पुराना मार्ग (पूर्व दिशा): यहाँ पर्याप्त धूप मिलती थी, जिससे ग्लेशियर जमा नहीं होते थे और मार्ग सुरक्षित था।

​वर्तमान मार्ग (दक्षिण दिशा): इस मार्ग पर धूप कम पड़ती है, जिसके कारण ग्लेशियर और बर्फ लंबे समय तक जमी रहती है, जो एवलांच को न्यौता देती है।

​वैज्ञानिकों के अहम सुझाव और चेतावनी

​रिसर्च पेपर में सरकार और प्रशासन को स्थिति बिगड़ने से पहले कुछ कड़े कदम उठाने की सलाह दी गई है:

​रोपवे परियोजना: वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि केदारनाथ रोपवे प्रोजेक्ट पर तेजी से काम होना चाहिए ताकि पैदल मार्ग पर यात्रियों का दबाव कम हो सके।

​पुराना पैदल मार्ग: आपदा से पहले वाले पुराने रास्ते को फिर से बहाल करने पर विचार करने की जरूरत है।

​सतत विकास: बढ़ते तापमान और इकोसिस्टम में बदलाव को देखते हुए हिमालयी क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का सही प्रबंधन आवश्यक है।

​श्रद्धालुओं की लापरवाही पड़ सकती है भारी

​रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि कई तीर्थयात्री खतरे को नजरअंदाज कर एवलांच जोन में तस्वीरें खींचते और रुकते हैं। अप्रैल से जून के बीच, जब ऊपरी इलाकों में बर्फ कच्ची होती है, तब यह जोखिम सबसे ज्यादा होता है।

​विशेष नोट: पिछले कुछ दशकों में उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों (नंदा देवी, त्रिशूल और डोकरियानी ग्लेशियर) में हुए हिमस्खलनों में सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। ऐसे में केदारनाथ यात्रा के दौरान सतर्कता बरतना अनिवार्य है।

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