Saturday, September 12, 2026
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‘महीनों का मंत्री नहीं बनना चाहता’, भाजपा विधायक दिलीप रावत के बयान से उत्तराखंड में सियासी भूचाल

उत्तराखंड की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। भाजपा विधायक दिलीप रावत के ताजा बयान ने ‘आग में घी’ का काम किया है, जिससे न केवल विपक्षी कांग्रेस हमलावर है, बल्कि पार्टी के भीतर भी असहज स्थिति पैदा हो गई है।

‘महीनों का मंत्री नहीं बनना चाहता’, भाजपा विधायक दिलीप रावत के बयान से उत्तराखंड में सियासी भूचाल

देहरादून: धामी सरकार के हालिया मंत्रिमंडल विस्तार ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। लैंसडाउन से भाजपा विधायक दिलीप रावत ने यह कहकर सबको चौंका दिया है कि वे केवल कुछ महीनों के लिए मंत्री पद की जिम्मेदारी नहीं संभालना चाहते थे। उनके इस बयान को कैबिनेट विस्तार के ‘समय और औचित्य’ पर सीधे सवाल के रूप में देखा जा रहा है।

विधायक दिलीप रावत का तर्क

दिलीप रावत ने स्पष्ट किया कि चूंकि सरकार का कार्यकाल अब अंतिम वर्ष में है और चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में इतने कम समय के लिए मंत्री बनना व्यावहारिक नहीं है। उनके अनुसार:

* सीमित समय: किसी भी विभाग को समझने और उस पर पकड़ बनाने में महीनों लग जाते हैं।

* चुनावी व्यस्तता: अब समय विकास कार्यों के बजाय चुनाव की तैयारियों और क्षेत्र में सक्रिय होने का है।

* प्रभावशीलता: इतने कम समय में किसी नए मंत्री के लिए अपने विजन को धरातल पर उतारना लगभग असंभव है।

कांग्रेस ने ली चुटकी: हरक सिंह रावत का तंज

कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत ने इस मौके को भुनाते हुए भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने दिलीप रावत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“दिलीप रावत की बात आधा सच है। यह सही है कि अब समय बहुत कम बचा है और नए मंत्री कुछ खास नहीं कर पाएंगे। लेकिन यह कहना कि वे खुद मंत्री नहीं बनना चाहते थे, हास्यास्पद है। हकीकत यह है कि उन्हें मौका ही नहीं दिया गया।”

हरक सिंह ने आगे आरोप लगाया कि भाजपा में मंत्री बनने के लिए योग्यता के बजाय ‘नेताओं की कृपा’ अधिक मायने रखती है।

नए मंत्रियों के सामने ‘अग्निपरीक्षा’

20 मार्च 2026 को हुए विस्तार में शामिल पांच नए मंत्रियों (मदन कौशिक, भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा, खजान दास और राम सिंह कैड़ा) के सामने अब दोहरी चुनौती है:

* विभाग संभालना: उन्हें चंद महीनों में अपनी कार्यक्षमता साबित करनी होगी।

* क्षेत्र बचाना: आगामी चुनावों के लिए उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्रों में भी पूरा समय देना होगा।

रणनीतिक चूक या राजनीतिक संतुलन?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने क्षेत्रीय और जातीय समीकरण (कुमाऊं बनाम गढ़वाल) साधने के लिए यह विस्तार किया है। हालांकि, विधायक दिलीप रावत के ‘बागी’ सुरों ने इस रणनीति पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देखना यह है कि क्या भाजपा नेतृत्व इस आंतरिक असंतोष को शांत कर पाता है या विपक्ष इसे 2027 के चुनावों के लिए बड़ा मुद्दा बनाएगा।

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