हरीश राणा को मिली इच्छामृत्यु: AIIMS में 10 दिन भर्ती रहने के बाद ली आखिरी सांस, भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला ऐतिहासिक मामला
हरीश राणा को मिली इच्छामृत्यु: AIIMS में 10 दिन भर्ती रहने के बाद ली आखिरी सांस, भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला ऐतिहासिक मामला
नई दिल्ली/गाजियाबाद: 13 साल से पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (कोमा जैसी स्थिति) में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा का AIIMS दिल्ली में निधन हो गया। सुप्रीम कोर्ट से पैसिव इच्छामृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति मिलने के बाद AIIMS में लगभग 10 दिन की प्रक्रिया के दौरान उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली।
यह भारत में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के बाद पहला ऐसा मामला है, जिसमें कोर्ट ने स्पष्ट रूप से किसी व्यक्ति को पैसिव इच्छामृत्यु का अधिकार देते हुए जीवन-समर्थन हटाने की अनुमति दी।
क्या हुआ पूरा घटनाक्रम?
2013 का हादसा: चंडीगढ़ में B.Tech की पढ़ाई करते समय पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश को गंभीर ब्रेन इंजरी हुई। उसके बाद से वे बिस्तर पर ही पड़े थे – न बोल पाते, न कोई प्रतिक्रिया देते।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के माता-पिता की याचिका पर ऐतिहासिक आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (CANH) भी जीवन-समर्थन का हिस्सा है और इसे हटाना पैसिव इच्छामृत्यु है। इससे हरीश को “मरने का अधिकार” (Right to Die with Dignity – अनुच्छेद 21) मिला।
AIIMS में प्रक्रिया: 14 मार्च 2026 को हरीश को AIIMS के पैलिएटिव केयर यूनिट (IRCH) में भर्ती कराया गया।
वेंटिलेटर और अन्य लाइफ सपोर्ट हटाए गए।
फीडिंग ट्यूब से खाना-पानी बंद किया गया।
दर्द न हो, इसके लिए पैलिएटिव दवाएं दी गईं।
डॉक्टरों की 10 सदस्यीय टीम (डॉ. सीमा मिश्रा की अगुवाई में) 24 घंटे निगरानी करती रही।
हरीश की शारीरिक सहनशक्ति ने शुरू में डॉक्टरों को चौंकाया था। 10 दिन तक खाना-पानी बंद रहने के बावजूद उनकी हालत अपेक्षाकृत स्थिर रही, लेकिन अंततः 24 मार्च 2026 को उन्होंने आखिरी सांस ली।
परिवार की भावनाएं
हरीश के माता-पिता (अब बुजुर्ग) लंबे समय से बेटे की इस स्थिति से जूझ रहे थे। उन्होंने कहा था – “हम बेटे को सम्मानजनक विदाई देना चाहते हैं।” अंतिम दिनों में मां AIIMS के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ती नजर आईं। परिवार ने पूरे मामले में भावनात्मक रूप से बहुत संघर्ष किया।
भारत में इच्छामृत्यु का कानूनी सफर
2011: अरुणा शानबाग केस में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु की अवधारणा को मान्यता दी।
2018: पांच जजों की बेंच ने विस्तृत गाइडलाइंस जारी कीं।
2026: हरीश राणा केस में पहली बार इन गाइडलाइंस को लागू करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया।
नोट: एक्टिव इच्छामृत्यु (कोई दवा देकर जान लेना) भारत में अभी भी अवैध है। केवल पैसिव इच्छामृत्यु (लाइफ सपोर्ट हटाना) ही कुछ शर्तों के साथ अनुमत है।
यह मामला देशभर में “मरने के अधिकार” और “डिग्निटी इन डेथ” पर गहरी बहस छेड़ गया है। AIIMS के डॉक्टरों और पैलिएटिव केयर टीम ने प्रक्रिया को पूरी तरह मानवीय और दर्दरहित रखने का दावा किया है।
परिवार के प्रति गहरी संवेदना। हरीश राणा की आत्मा को शांति मिले।
