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शीतला अष्टमी पर देवी को बासी खाने का भोग क्यों लगाते हैं? जानिए महत्व, परंपरा और पूजा विधि

शीतला अष्टमी पर देवी को बासी खाने का भोग क्यों लगाते हैं? जानिए महत्व, परंपरा और पूजा विधि

न्यूज़ अपडेट: 8 मार्च 2026

शीतला अष्टमी (Sheetala Ashtami या बसोड़ा/बसौड़ा व्रत) हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह होली के ठीक 8 दिन बाद आता है। 2026 में यह 11 मार्च (बुधवार) को है। शीतला माता रोगों की देवी हैं – वे चेचक (माता), खसरा, त्वचा रोग, नेत्र विकार और संक्रामक बीमारियों से रक्षा करती हैं। माता शीतला को शीतलता (ठंडक) का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस दिन बासी (ठंडा) भोजन का भोग लगाया जाता है।

क्यों लगाते हैं बासी खाने का भोग? (धार्मिक और वैज्ञानिक कारण)

धार्मिक मान्यता: माता शीतला को बासी भोजन बहुत प्रिय है। स्कंद पुराण और लोक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा जी ने सृष्टि को रोगमुक्त रखने का जिम्मा शीतला माता को दिया था। वे ठंडे और शांत स्वभाव की हैं, इसलिए गर्म (ताजा पकाया) भोजन उनकी शीतलता के विरुद्ध है। एक दिन पहले (शीतला सप्तमी) बनाए गए भोजन को ही भोग लगाया जाता है – इससे माता प्रसन्न होकर परिवार को रोगों से बचाती हैं।

परंपरा: इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता (बसौड़ा नाम इसी से आया)। एक दिन पहले पूड़ी, पुआ, हलवा, रबड़ी, दही-चावल, मीठे चावल, चना, बाजरा, पूरी, सब्जी आदि बनाकर रखे जाते हैं। अष्टमी पर ये बासी भोजन ही भोग लगता है और प्रसाद के रूप में खाया जाता है।

वैज्ञानिक कारण: चैत्र में ठंड खत्म होकर गर्मी शुरू होती है। ताजा गर्म खाना बनाने से शरीर में उष्णता बढ़ सकती है, जिससे त्वचा रोग या संक्रामक बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ता है। बासी ठंडा खाना खाने से शरीर शीतल रहता है और पाचन बेहतर होता है। यह मौसमी बदलाव में स्वास्थ्य संतुलन बनाए रखने की प्राचीन समझ है।

शीतला अष्टमी पूजा विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)

सप्तमी पर तैयारी (10 मार्च 2026):

घर और रसोई साफ करें।

ताजा भोजन (पूड़ी, हलवा, रबड़ी, दही-चावल, चना, मीठे पकवान आदि) बनाकर रखें। ताजा खाना न बनाएं।

अष्टमी के दिन पूजा (11 मार्च 2026):

सुबह जल्दी उठें, शीतल जल से स्नान करें।

स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें (आरोग्य, सुख-समृद्धि की कामना करें)।

चौकी पर माता शीतला की प्रतिमा या फोटो विराजमान करें।

रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीपक जलाएं।

बासी भोजन का भोग लगाएं (दही, रबड़ी, पूड़ी, हलवा, मीठे चावल आदि)।

शीतला स्तोत्र या ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः मंत्र का जाप करें।

व्रत कथा सुनें या पढ़ें।

आरती करें और प्रसाद ग्रहण करें।

दान-पुण्य करें (गरीबों को बासी भोजन या दान दें)।

मंत्र:

ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः

वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।

मार्जनी कलशोपेतां सूर्पालंकृत मस्तकाम्॥

व्रत नियम:

ताजा खाना न बनाएं, चूल्हा न जलाएं।

किसी से झगड़ा न करें, गुस्सा न करें।

माता से रोग मुक्ति की प्रार्थना करें।

यह व्रत मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। महिलाएं संतान सुख और परिवार की सेहत के लिए रखती हैं।

 

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