बिहार में NDA के अंदर ही फूट! नीतीश के सहयोगी क्यों मांग रहे शराबबंदी खत्म करने की? दोनों पक्षों की पूरी दलीलें
बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी (Bihar Prohibition and Excise Act) अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए सिरदर्द बन गई है। NDA गठबंधन के सहयोगी दल खुद इस कानून की समीक्षा या हटाने की मांग कर रहे हैं, जबकि नीतीश इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं। हाल ही में (फरवरी 2026) बिहार विधानसभा में नीतीश की मौजूदगी में ही राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के विधायक माधव आनंद ने शराबबंदी की समीक्षा की मांग की। इससे पहले जीतन राम मांझी (HAM) जैसे सहयोगी भी कई बार इसे “फेल” बता चुके हैं।
सहयोगी क्यों मांग कर रहे हैं समीक्षा/हटाना? मुख्य कारण और दलीलें
NDA के सहयोगी (जैसे RLM, HAM, BJP के कुछ नेता) शराबबंदी को “फ्लॉप” मानते हैं। उनकी प्रमुख दलीलें:
अवैध शराब और जहरीली मौतें: बैन के बावजूद होम डिलीवरी, स्पूरियस शराब से सैकड़ों मौतें हो रही हैं। गरीब लोग जहरीली शराब पीकर मर रहे हैं, जबकि अमीर/संगठित माफिया बच जाते हैं।
आर्थिक नुकसान: राज्य को सालाना हजारों करोड़ का राजस्व घाटा हो रहा है (2015-16 में excise से ~₹4,000 करोड़ आते थे, अब 9-10 साल में अनुमानित ₹40,000+ करोड़ का नुकसान)। यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कों पर लग सकता था।
कानून का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार: छोटे-मोटे लोग (खासकर SC/ST/EBC/OBC) पकड़े जा रहे हैं, जबकि बड़े स्मगलर पुलिस/अधिकारियों से सेटिंग कर बच जाते हैं। 12 लाख+ गिरफ्तारियों में 85%+ गरीब/पिछड़े वर्ग के हैं।
युवाओं का करियर बर्बाद: युवा अवैध शराब बेचने में लगे हैं, जिससे अपराध बढ़ रहा है। BJP के RK सिंह जैसे नेता कह चुके हैं कि बैन युवाओं की जिंदगी बर्बाद कर रहा है।
क्रियान्वयन फेल: पुलिस स्टाफ की कमी, स्मगलिंग के नए तरीके, और संभावित मिलीभगत से बैन असफल साबित हो रहा है।
नीतीश कुमार और समर्थकों की दलीलें (बैन जारी रखने के पक्ष में)
नीतीश इसे महिलाओं की मांग पर लिया “ड्रीम प्रोजेक्ट” बताते हैं और हटाने से इनकार करते हैं। JDU प्रवक्ता अभिषेक झा ने कहा: “कानून की समय-समय पर समीक्षा होती है, लेकिन ढिलाई या खत्म नहीं होगी।”
महिलाओं और परिवारों का फायदा: घरेलू हिंसा, मारपीट में कमी आई। महिलाओं ने इसे सबसे बड़ा समर्थन दिया था। अध्ययनों से पता चला कि परिवार अब ज्यादा पौष्टिक भोजन पर खर्च करते हैं, कैलोरी/प्रोटीन बढ़ा।
सामाजिक सुधार: शराब से होने वाली मौतें, गरीबी, अपराध कम हुए। नीतीश कहते हैं कि बैन महिलाओं/बच्चों के लिए फायदेमंद रहा।
राजनीतिक मजबूती: महिलाएं (जीविका दीदी आदि) इसका समर्थन करती हैं। हटाने से “प्रो-वुमन” इमेज खराब हो सकती है।
कानून मजबूत: JDU का रुख साफ – “नीतीश ने लागू किया, आगे भी रखेंगे।” कोई ढिलाई नहीं।
कुल मिलाकर क्या स्थिति है?
शराबबंदी अब नीतीश vs उनके सहयोगियों की लड़ाई बन गई है। 2025-26 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा गरमाया हुआ है। विपक्ष (RJD, जन सुराज) भी बैन हटाने/समीक्षा की बात कर रहे हैं, जबकि NDA में दरार दिख रही है। नीतीश अभी पीछे नहीं हट रहे, लेकिन सहयोगियों का दबाव बढ़ रहा है। क्या बैन की समीक्षा होगी या कानून बरकरार रहेगा? बिहार की राजनीति में यह बड़ा ट्विस्ट है! 🍻🚫 क्या आपको लगता है शराबबंदी हटनी चाहिए? कमेंट में बताएं!
