उत्तराखंड

खटीमा में पिंक टॉयलेट: 7 लाख खर्च कर बनवाया, उद्घाटन के बाद 12 महीने से ताला लटका – महिलाएं परेशान

खटीमा में पिंक टॉयलेट: 7 लाख खर्च कर बनवाया, उद्घाटन के बाद 12 महीने से ताला लटका – महिलाएं परेशान

उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के खटीमा शहर में महिलाओं की सुविधा के नाम पर एक बड़ा उदाहरण सामने आया है – पिंक टॉयलेट! मार्च 2025 में लोकल कंपनी पॉलीप्लेक्स कॉर्पोरेशन ने CSR फंड से करीब 7.50 लाख रुपये खर्च कर यह हाई-टेक पिंक टॉयलेट बनवाया था। खटीमा तहसील प्रशासन ने पुराने अस्पताल परिसर (खटीमा-सितारगंज रोड) में जमीन दी, और 3 मार्च 2025 को तत्कालीन SDM रविंद्र सिंह बिष्ट ने इसका भव्य उद्घाटन किया।

लेकिन उद्घाटन के ठीक 12 महीने (फरवरी 2026 तक) बीत चुके हैं – पिंक टॉयलेट पर आज भी ताला लटका हुआ है! धूल-मिट्टी जमा हो गई है, कोई सफाई नहीं, कोई रखरखाव नहीं। महिलाएं बाजार या रोड पर आने पर शौचालय की तलाश में परेशान होती हैं, लेकिन सुविधा बंद पड़ी है।

क्यों लगा ताला? मुख्य कारण

प्रशासन ने निर्माण का काम कंपनी को दिया और संचालन की जिम्मेदारी नगर निगम/नगर पालिका को सौंप दी।

लेकिन नगर निगम ने साफ-सफाई, पानी की व्यवस्था, रखरखाव या स्टाफ की नियुक्ति नहीं की।

तहसीलदार वीरेंद्र सिंह सजवान ने मीडिया से कहा: “प्रशासन ने CSR फंड से बनवाया और EO (नगर निगम के कार्यकारी अधिकारी) को सौंप दिया। अभी तक चालू नहीं हुआ है। SDM ने EO को पब्लिक सुविधाओं का ठीक संचालन करने का निर्देश दिया है।”

पिछले साल मई 2025 में ही पानी की कमी की वजह से सुविधा सूख गई थी (अमर उजाला रिपोर्ट), लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

CSR फंड का इस्तेमाल सिर्फ निर्माण तक सीमित रहा – रखरखाव और ऑपरेशनल कॉस्ट का कोई प्लान नहीं बनाया गया, जिससे यह सफेद हाथी बन गया।

महिलाओं की परेशानी

खटीमा बाजार में आने वाली महिलाएं (घरेलू, बाजार जाने वाली, कामकाजी) को शौचालय की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ता है।

कई रिपोर्ट्स में महिलाओं ने शिकायत की कि “बने तो थे सम्मान के लिए, लेकिन उपयोग में नहीं आए”।

यह मामला CSR फंड के गलत/अधूरे इस्तेमाल का क्लासिक उदाहरण बन गया है – जहां सिर्फ फोटो सेशन और उद्घाटन होता है, लेकिन लॉन्ग-टर्म प्लानिंग नहीं।

अभी क्या स्थिति?

फरवरी 2026 तक कोई बड़ा अपडेट नहीं – तहसीलदार ने EO को निर्देश दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिख रहा।

स्थानीय लोग और मीडिया (ETV भारत, अमर उजाला आदि) ने इस मुद्दे को उठाया है, उम्मीद है कि जल्द ही नगर निगम या प्रशासन इसे खुलवाएगा और रखरखाव शुरू करेगा।

बैरेली से खटीमा ज्यादा दूर नहीं – UP-उत्तराखंड बॉर्डर पर ऐसे मुद्दे आम हैं। महिलाओं की सुविधा के नाम पर करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन अगर रखरखाव न हो तो सब बेकार!

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