Thursday, September 10, 2026
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‘महाकाल के सामने कोई VIP नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर की VIP दर्शन व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की

‘महाकाल के सामने कोई VIP नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर की VIP दर्शन व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन के प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में VIP दर्शन और गर्भगृह में विशेष प्रवेश की व्यवस्था को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “महाकाल के दरबार में कोई VIP नहीं है”, लेकिन मंदिर की दर्शन व्यवस्था और प्रबंधन में न्यायपालिका का हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। यह फैसला मंदिर प्रशासन और प्रशासक (उज्जैन कलेक्टर) के विवेक पर छोड़ दिया गया है।

याचिका में याचिकाकर्ता (दर्पण अवस्थी) ने आरोप लगाया था कि गर्भगृह में VIP (जैसे नेता, अधिकारी, प्रभावशाली व्यक्ति) को जल अर्पण और विशेष दर्शन की अनुमति मिलती है, जबकि आम श्रद्धालुओं को बाहर से ही दर्शन करने पड़ते हैं। इससे समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन हो रहा है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सभी के लिए समान पहुंच हो या VIP व्यवस्था पूरी तरह बंद की जाए।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की बेंच ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की:

“ऐसी याचिकाएं दायर करने वाले असली श्रद्धालु नहीं होते, उनका उद्देश्य कुछ और होता है।”

“मंदिर प्रबंधन और दर्शन व्यवस्था का फैसला प्रशासन करेगा, कोर्ट नहीं।”

“ये फैसला हम क्यों लें? आप अपनी सुझाव मंदिर प्रशासन के सामने रख सकते हैं।”

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दी और कहा कि वे मंदिर समिति या प्रशासन से संपर्क कर सुझाव दे सकते हैं। इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) ने भी इसी तरह की याचिका को 2025 में खारिज कर दिया था, जहां कहा गया था कि VIP कौन होगा, इसका फैसला कलेक्टर के विवेक पर है और कोई वैधानिक परिभाषा नहीं है।

महाकालेश्वर मंदिर की वर्तमान व्यवस्था:

गर्भगृह में आम श्रद्धालुओं का प्रवेश लगभग 2.5 साल से बंद है (भीड़ और सुरक्षा कारणों से)।

VIP/अतिविशिष्ट व्यक्तियों को विशेष अनुमति से प्रवेश मिलता है, लेकिन कोई आधिकारिक VIP सूची नहीं है।

रोजाना लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन ज्यादातर बाहर से ही दर्शन करते हैं।

यह फैसला VIP संस्कृति और धार्मिक स्थलों में समानता की बहस को फिर से गरमा गया है। कई लोग इसे राहत मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे भेदभावपूर्ण बता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित है, जब तक कोई स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन न हो।

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