AI की बढ़ती ‘भूख’: डेटा सेंटर्स से बिजली की खपत बढ़ रही, क्या आने वाला है संकट?
AI की बढ़ती ‘भूख’: डेटा सेंटर्स से बिजली की खपत बढ़ रही, क्या आने वाला है संकट?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेज रफ्तार दुनिया को बदल रही है, लेकिन इसकी कीमत बिजली के रूप में चुकानी पड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में ग्लोबल डेटा सेंटर्स ने करीब 415 टेरावॉट-ऑवर (TWh) बिजली खपत की, जो वैश्विक बिजली का 1.5% है। 2030 तक यह दोगुनी होकर 945 TWh पहुंच सकती है—जितनी जापान की कुल सालाना खपत है। AI इसका मुख्य ड्राइवर है, क्योंकि AI मॉडल ट्रेनिंग और रनिंग के लिए हाई-पावर सर्वर्स की जरूरत पड़ती है।
अमेरिका में डेटा सेंटर्स पहले ही 4% बिजली खा रहे हैं, जो 2030 तक 9-12% तक पहुंच सकती है। वहां पुराने कोल और गैस प्लांट्स को फिर से चालू किया जा रहा है, क्योंकि AI डिमांड ग्रिड पर दबाव डाल रही है। कुछ इलाकों में बिजली की कीमतें बढ़ रही हैं, और शॉर्टेज की आशंका है—मॉर्गन स्टैनली ने 2028 तक 20% कमी की चेतावनी दी है। यूरोप और एशिया में भी ग्रिड स्ट्रेन हो रहा है।
भारत में स्थिति और चुनौतीपूर्ण है। यहां डेटा सेंटर्स की कैपेसिटी 1.5 GW से बढ़कर 2030 तक 9 GW हो सकती है। 2025-2030 में अतिरिक्त बिजली डिमांड का 20% AI से आ सकता है। गर्मियों में पहले से बिजली कटौती होती है, और डेटा सेंटर्स से पानी-बिजली दोनों पर बोझ बढ़ेगा। एक डेटा सेंटर रोज लाखों लीटर पानी कूलिंग के लिए इस्तेमाल करता है। सरकार AI को बिजली बचत में इस्तेमाल कर रही है—स्मार्ट मीटर्स से चोरी रोकना, फॉल्ट प्रेडिक्ट करना और बिल कम करना। लेकिन अगर रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रिड अपग्रेड नहीं हुए, तो संकट गहरा सकता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि AI एफिशिएंसी बढ़ाकर बिजली बचत भी कर सकता है, लेकिन अभी उसकी ‘भूख’ ज्यादा है। टेक कंपनियां रिन्यूएबल्स और न्यूक्लियर पर निवेश कर रही हैं, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग लक्ष्यों पर असर पड़ रहा है। क्या AI हमें स्मार्ट बनाएगा या बिजली संकट लाएगा—यह बड़ा सवाल है।
