जघन्य अपराधों के दोषियों को बार-बार मिल रही राहत: राम रहीम की पैरोल और सेंगर की सजा निलंबन से उठते सवाल
जघन्य अपराधों के दोषियों को बार-बार मिल रही राहत: राम रहीम की पैरोल और सेंगर की सजा निलंबन से उठते सवाल
भारतीय न्याय व्यवस्था में जघन्य अपराधों के दोषियों को मिलने वाली कानूनी राहतें अक्सर विवाद का विषय बनती हैं। हाल के दो मामलों ने फिर से इस बहस को हवा दी है: डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बार-बार पैरोल मिलना और उन्नाव रेप कांड के दोषी पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित होना। दोनों ही मामले बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े हैं, फिर भी दोषियों को जेल से बाहर रहने का मौका मिल रहा है। यह सवाल उठाता है कि क्या न्याय व्यवस्था में प्रभावशाली लोगों के लिए अलग नियम हैं?
राम रहीम का मामला: पैरोल की लंबी फेहरिस्त
गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दो शिष्यों से बलात्कार के लिए 20 साल की सजा सुनाई गई थी। बाद में पत्रकार की हत्या के मामले में भी उम्रकैद हुई। रोहतक की सुनारिया जेल में बंद राम रहीम को 2020 से अब तक 14 से ज्यादा बार पैरोल या फरलो मिल चुकी है। 2025 में ही जनवरी में 30 दिन, अप्रैल में 21 दिन और अगस्त में 40 दिन की पैरोल दी गई। कई बार ये राहतें चुनावों से ठीक पहले मिलीं – जैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले जनवरी 2025 में और हरियाणा चुनावों के आसपास।
कानूनी आधार: हरियाणा जेल मैनुअल के तहत हर कैदी को साल में 70 दिन पैरोल और 21 दिन फरलो का हक है। अच्छे व्यवहार, स्वास्थ्य कारण या पारिवारिक जरूरतों के आधार पर पैरोल दी जाती है। राम रहीम के वकील कहते हैं कि यह कानूनी अधिकार है और राजनीति से जुड़ा नहीं। लेकिन विपक्षी दल और सामाजिक संगठन इसे राजनीतिक प्रभाव का नतीजा बताते हैं। डेरा सच्चा सौदा के लाखों अनुयायी हरियाणा, पंजाब और पड़ोसी राज्यों में वोट बैंक माने जाते हैं। कई पैरोल चुनावों के समय मिलने से साजिश की आशंका बढ़ती है।
कुलदीप सिंह सेंगर: तकनीकी आधार पर सजा निलंबन
2017 के उन्नाव रेप कांड में नाबालिग से बलात्कार और अपहरण के लिए कुलदीप सिंह सेंगर को 2019 में उम्रकैद की सजा मिली। पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के अलग मामले में 10 साल की सजा भी है। 23 दिसंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप मामले में सजा निलंबित कर दी और अपील लंबित रहने तक जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि सेंगर ने पहले ही 7 साल 5 महीने जेल काट ली है और POCSO एक्ट की गंभीर धारा 5 (पब्लिक सर्वेंट द्वारा अपराध) लागू नहीं होती, क्योंकि अपराध आधिकारिक ड्यूटी में नहीं हुआ।
कानूनी आधार: अपील के दौरान सजा निलंबन CrPC की धारा 389 के तहत संभव है। कोर्ट ने माना कि न्यूनतम सजा 7 साल है, जो सेंगर काट चुके हैं। शर्तें लगाई गईं – पीड़िता के घर के 5 किमी दायरे में न जाना, धमकी न देना आदि। हालांकि, दूसरी सजा चल रही है, इसलिए सेंगर अभी जेल में ही हैं। CBI और पीड़िता सुप्रीम कोर्ट जा रही हैं। पीड़िता ने इसे अपने परिवार के लिए ‘काल’ बताया।
कानूनी प्रावधान और विवाद
भारत में पैरोल जेल एक्ट 1894 और राज्य नियमों से governed है। अच्छा व्यवहार दिखाने वाले कैदियों को सुधार के लिए राहत मिलती है। सजा निलंबन अपील के दौरान होता है, अगर कोर्ट को लगे कि अपील में समय लगेगा और दोषी ज्यादा समय जेल काट चुका है। लेकिन जघन्य अपराधों में ये राहतें सवाल उठाती हैं:
प्रभावशाली लोग आसानी से लाभ उठाते हैं।
पीड़ितों का न्याय प्रभावित होता है।
राजनीतिक प्रभाव की आशंका।
बिलकिस बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की समयपूर्व रिहाई रद्द की थी। विशेषज्ञ कहते हैं कि पारदर्शिता और सख्त दिशानिर्देश जरूरी हैं।
निष्कर्ष: न्याय का तराजू संतुलित हो
राम रहीम और सेंगर जैसे मामलों से न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए, लेकिन प्रभाव और तकनीकी खामियां राहत का रास्ता बन जाती हैं। पीड़ितों की सुरक्षा और दोबारा अपराध की आशंका को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से उम्मीद है कि ये मामले नजीर बनेंगे और व्यवस्था मजबूत होगी। आखिर न्याय केवल सजा नहीं, पीड़ित को सुरक्षा और सम्मान भी है।
