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“ना का मतलब सिर्फ ना”: शशि थरूर ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने वाला विधेयक लोकसभा में पेश किया

“ना का मतलब सिर्फ ना”: शशि थरूर ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने वाला विधेयक लोकसभा में पेश किया

नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 5 दिसंबर 2025 को लोकसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया, जो वैवाहिक बलात्कार (marital rape) को अपराध घोषित करने का प्रावधान करता है। थरूर ने कहा कि भारत को संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए और “ना का मतलब ना” से आगे बढ़कर “केवल हां का मतलब हां” की ओर बढ़ना होगा। यह विधेयक भारतीय न्याय संहिता (BNS) में संशोधन लाकर वैवाहिक बलात्कार की छूट को समाप्त करने का प्रयास करता है, ताकि विवाह महिला के सहमति देने या न देने के अधिकार को नकार न सके।

लोकसभा में बिल पेश करते हुए थरूर ने जोर देकर कहा, “हर महिला को विवाह में भी शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा का मौलिक अधिकार मिलना चाहिए। हमारा कानूनी ढांचा इसकी रक्षा करने में विफल रहा है।” उन्होंने X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा, “वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण भारत के कानूनी ढांचे में तत्काल आवश्यकता है। यह संशोधन BNS की धारा 63 को बदलकर वैवाहिक अपवाद को हटा देगा। विवाह सहमति के अधिकार को नकार नहीं सकता।” बिल के उद्देश्यों और कारणों के बयान में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान कानून 18 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ गैर-सहमति वाले यौन संबंध को अपराध नहीं मानता, जो महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है।

थरूर ने इसे हिंसा का मुद्दा बताते हुए कहा, “वैवाहिक बलात्कार विवाह के बारे में नहीं, बल्कि हिंसा के बारे में है। कार्रवाई का समय आ गया है।” यह बिल महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने का प्रयास है, जो संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की सिफारिशों से प्रेरित है। भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की मांग लंबे समय से उठ रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले के बावजूद कोई बदलाव नहीं आया। थरूर का यह कदम विपक्ष की ओर से महिलाओं के अधिकारों पर फोकस को दर्शाता है।

इसके अलावा, थरूर ने दो अन्य प्राइवेट मेंबर बिल भी पेश किए। पहला, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थिति संहिता, 2020 में संशोधन का, जो कर्मचारियों के अधिक काम और बर्नआउट को रोकने के लिए है। उन्होंने कहा, “51% कार्यबल 49 घंटे से ज्यादा काम करता है और 78% बर्नआउट का शिकार हैं, जैसा कि अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल की मौत से स्पष्ट है।” दूसरा बिल राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुनर्गठन आयोग स्थापित करने का है, जो जनगणना डेटा और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर सिफारिशें देगा।

प्राइवेट मेंबर बिल आमतौर पर सरकार के जवाब के बाद वापस ले लिए जाते हैं, लेकिन थरूर के प्रयासों ने पहले भी सामाजिक मुद्दों पर बहस छेड़ी है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका स्वागत किया है, जबकि कुछ भाजपा सांसदों ने इसे “पारिवारिक मूल्यों पर हमला” बताया। जानकारों का मानना है कि यह बिल संसद में लंबी चर्चा का विषय बनेगा, खासकर 2026 के चुनावों से पहले। थरूर ने अपील की कि सभी दल महिलाओं की गरिमा के लिए एकजुट हों। फिलहाल, बिल पर आगे की कार्यवाही संसदीय समिति को सौंपी जा सकती है।

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