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WHO ने मोटापे के इलाज में GLP-1 दवाओं को दी सिफारिश: फैटी लोगों के लिए क्यों है जरूरी, जानें पूरी डिटेल

WHO ने मोटापे के इलाज में GLP-1 दवाओं को दी सिफारिश: फैटी लोगों के लिए क्यों है जरूरी, जानें पूरी डिटेल

नई दिल्ली। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 1 दिसंबर 2025 को मोटापे के इलाज में GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाओं की सिफारिश की है। यह पहली बार है जब WHO ने मोटापे को एक क्रॉनिक (लंबे समय तक चलने वाली) बीमारी के रूप में मान्यता देते हुए इन दवाओं को लंबे समय के इलाज का हिस्सा बताया है। गाइडलाइंस JAMA जर्नल में पब्लिश हुईं, जिसमें लिराग्लूटाइड, सेमाग्लूटाइड (ओजेम्पिक, वेगोवी) और टिरजेपेटाइड (मौनजारो) जैसी दवाओं को वयस्कों के लिए कंडीशनल रेकमेंडेशन दी गई। WHO के अनुसार, मोटापा अब वैश्विक महामारी है, जो 1 अरब से ज्यादा लोगों को प्रभावित करता है और 2030 तक इसके आर्थिक बोझ से 3 ट्रिलियन डॉलर का खर्च हो सकता है।

GLP-1 दवाएं क्या हैं और कैसे काम करती हैं?

GLP-1 (ग्लूकागॉन-लाइक पेप्टाइड-1) एक हार्मोन है जो आंतों से निकलता है और भोजन के बाद रक्त शर्करा को नियंत्रित करता है। ये दवाएं इसी हार्मोन की नकल करती हैं। इनके मुख्य फायदे:

भूख कम करना: दिमाग के एपेटाइट सेंटर को सिग्नल देकर ज्यादा खाने से रोकती हैं।

वजन घटाना: औसतन 15-20% वजन कम करने में मदद, जो डाइट-एक्सरसाइज से मुश्किल होता है।

अन्य लाभ: टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम, हृदय रोग (हार्ट अटैक, स्ट्रोक), किडनी प्रॉब्लम्स और यहां तक कि समय से पहले मौत का रिस्क घटाती हैं।

WHO ने इन्हें केवल दवाओं के रूप में नहीं, बल्कि हेल्दी डाइट, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी और हेल्थ प्रोफेशनल्स की काउंसलिंग के साथ कॉम्बिनेशन में रेकमेंड किया। गर्भवती महिलाओं के लिए contraindicated (निषिद्ध) है। लॉन्ग-टर्म यूज का मतलब 6 महीने से ज्यादा लगातार इलाज।

मोटापे से ग्रस्त लोगों के लिए क्यों जरूरी?

मोटापा (BMI 30 या इससे ज्यादा) केवल ‘लाइफस्टाइल प्रॉब्लम’ नहीं, बल्कि जेनेटिक, बायोलॉजिकल और पर्यावरणीय फैक्टर्स से जुड़ी क्रॉनिक डिजीज है। WHO के मुताबिक, 2024 में इससे जुड़ी 3.7 मिलियन मौतें हुईं। फैटी लोगों के लिए GLP-1 दवाएं गेम-चेंजर हैं क्योंकि:

वजन कंट्रोल: पारंपरिक तरीकों से वजन घटाना मुश्किल होता है, लेकिन ये दवाएं बायोलॉजिकल रूट्स को टारगेट करती हैं, जिससे 10-15% वेट लॉस संभव।

कॉमोर्बिडिटी रिडक्शन: डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज जैसी बीमारियों का रिस्क 20-30% कम। खासकर टाइप-2 डायबिटीज वाले मरीजों में इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाती हैं।

मेंटल हेल्थ बेनिफिट: वजन घटने से डिप्रेशन, एंग्जायटी कम होती है और क्वालिटी ऑफ लाइफ सुधरती है।

प्रिवेंटिव: अगर जल्दी इस्तेमाल किया जाए, तो आगे की जटिलताओं से बचाव। उदाहरण के लिए, अमेरिका में 1/8 एडल्ट्स इन दवाओं पर हैं, और स्टडीज में हार्ट फेलियर का रिस्क 20% घटा।

हालांकि, रेकमेंडेशन कंडीशनल है क्योंकि लॉन्ग-टर्म सेफ्टी डेटा लिमिटेड है। साइड इफेक्ट्स जैसे नॉजिया, डायरिया, किडनी इश्यूज हो सकते हैं। WHO ने इंटेंसिव बिहेवियरल थेरेपी (डाइट-एक्सरसाइज काउंसलिंग) को साथ में अनिवार्य बताया।

चुनौतियां और भविष्य

ये दवाएं महंगी हैं (मासिक 10-15 हजार रुपये), और 2030 तक सिर्फ 10% जरूरतमंदों तक पहुंचेंगी। WHO ने मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने, प्राइस कम करने और हेल्थ सिस्टम को तैयार करने की अपील की। लो-मिडल इनकम कंट्रीज में एक्सेसिबिलिटी बड़ी समस्या। भारत जैसे देशों में, जहां मोटापा 20% से ऊपर है, ये दवाएं डायबिटीज मैनेजमेंट के लिए पहले से यूज हो रही हैं, लेकिन अब ओबेसिटी के लिए भी फोकस बढ़ेगा।

डायरेक्टर-जनरल टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने कहा, “ये दवाएं साइंटिफिक ब्रेकथ्रू हैं, जो मोटापे को ट्रीटेबल डिजीज बनाएंगी।” अगर आप मोटापे से जूझ रहे हैं, तो डॉक्टर से कंसल्ट करें – ये दवाएं अकेले नहीं, पूरे लाइफस्टाइल चेंज के साथ काम करेंगी। इससे न सिर्फ वजन, बल्कि हेल्दी लाइफ मिलेगी।

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