आर्कटिक की बर्फीली जंग में भारत का दांव: रूस का ‘आइसब्रेकर’ सौदे से मॉस्को-नई दिल्ली का नया गठजोड़!
आर्कटिक की बर्फीली जंग में भारत का दांव: रूस का ‘आइसब्रेकर’ सौदे से मॉस्को-नई दिल्ली का नया गठजोड़!
नई दिल्ली, 4 दिसंबर 2025: ठंडी आर्कटिक हवाओं में गर्माहट लाने वाला एक बड़ा कदम! रूस ने भारत को आर्कटिक-क्लास आइसब्रेकर जहाजों के संयुक्त निर्माण का प्रस्ताव दिया है, जो न केवल दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगा, बल्कि भारत को आर्कटिक क्षेत्र में मजबूत पैर जमाने का मौका भी देगा। यह घोषणा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 4-5 दिसंबर को होने वाली भारत यात्रा से ठीक पहले आई है, जहां यह सौदा फाइनल होने की पूरी संभावना है।
रूस के पहले उप-प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने स्पुतनिक इंडिया को बताया, “आर्कटिक-क्लास जहाजों के संयुक्त उत्पादन का आयोजन सहयोग का एक आशाजनक क्षेत्र बन सकता है।” ये जहाज 2-3 मीटर मोटी बर्फ को चीरकर साल भर उत्तरी समुद्री मार्ग (एनएसआर) पर नेविगेशन सुनिश्चित करेंगे। रूस का लक्ष्य 2030 तक एनएसआर से सालाना 150 मिलियन टन कार्गो (तेल, कोयला, एलएनजी) ले जाना है, जिसके लिए 50 से ज्यादा आइसब्रेकर और आइस-क्लास जहाजों की जरूरत है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस ने चीन के बजाय भारत को प्राथमिकता दी है, क्योंकि भारतीय शिपयार्ड ‘सक्षम और अनुकूल’ पाए गए।
भारतीय सरकार दो शिपयार्ड्स—एक सरकारी (हिंदुस्तान शिपयार्ड) और एक निजी—के साथ बातचीत में जुटी है, जिन्हें चार नॉन-न्यूक्लियर आइसब्रेकर बनाने का ऑर्डर मिल सकता है। इसकी अनुमानित लागत 6,000 करोड़ रुपये ($750 मिलियन) से ज्यादा है। रोसाटॉम (रूस की न्यूक्लियर एनर्जी कंपनी) के विशेष प्रतिनिधि व्लादिमीर पानोव ने पुष्टि की कि दोनों देश आइस-क्लास कार्गो वेसल्स पर एडवांस्ड टॉक्स में हैं। भारत को ट्रेनिंग, पर्यावरण प्रोजेक्ट्स और आगे के ऑर्डर्स (जैसे बड़े ऑयल टैंकर) का लालच भी दिया जा रहा है। हालांकि, विशेष स्टील और इंजनों की सप्लाई पर चिंताएं बाकी हैं।
यह सौदा भारत के लिए ‘रिकॉर्ड ऑफ लॉजिस्टिक्स एक्सचेंजेस’ (आरईएलओएस) समझौते को मजबूत करेगा, जो भारतीय जहाजों को रूसी आर्कटिक पोर्ट्स पर रिफ्यूलिंग, मरम्मत और बर्थिंग की सुविधा देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत की आर्कटिक काउंसिल में भूमिका बढ़ेगी और चाइनीज एकाधिकार रोका जा सकेगा। एनएसआर सुज कैनाल रूट से 40% कम समय लेता है, जो भारत-रूस व्यापार को बूस्ट देगा।
पुतिन की यात्रा में यह प्रस्ताव हाइलाइट होगा, जो मॉस्को-नई दिल्ली के ‘स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड’ रिश्तों को नई ऊंचाई देगा। भारत के शिपबिल्डिंग सेक्टर को वैश्विक मंच मिलेगा, जबकि रूस को प्रतिबंधों से राहत। क्या यह आर्कटिक का ‘ग्रेट गेम’ बदलेगा? आने वाले दिन बताएंगे, लेकिन फिलहाल, बर्फीले रास्ते पर भारत-रूस की साझेदारी गर्म हो रही है!
