उत्तराखंड

उत्तराखंड में वन्यजीवों का आतंक: कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने CM धामी को पत्र लिखा, कारणों की तह तक जाने की मांग

उत्तराखंड में वन्यजीवों का आतंक: कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने CM धामी को पत्र लिखा, कारणों की तह तक जाने की मांग

उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में गुलदार और भालू हमलों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। आमजन में दहशत फैल चुकी है, और इसी क्रम में प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की है। गोदियाल ने पत्र में कहा है कि राज्य के पर्वतीय जिलों में वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं, और इनके पीछे के कारणों की गहन जांच जरूरी है।

पत्र में गोदियाल ने उल्लेख किया कि पिछले कुछ वर्षों से वन्यजीवों द्वारा इंसानों पर हमलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। खासकर गुलदार और भालू अब आतंक का पर्याय बन चुके हैं। भालू विशेष रूप से आक्रामक हो गए हैं, जो इंसानी बस्तियों में घुसकर महिलाओं, बच्चों और किसानों पर हमला कर रहे हैं। गोदियाल ने कहा, “ये घटनाएं आम नागरिकों, किसानों, पशुपालकों और जंगलों में लकड़ी-घास लेने वालों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं। राज्य सरकार को इन कारणों की तह तक जाना चाहिए – क्या यह वन क्षेत्रों में कमी, जलवायु परिवर्तन या वन्यजीवों की बढ़ती आबादी की वजह से है?” उन्होंने मांग की कि प्रभावित क्षेत्रों में तुरंत क्विक रिस्पॉन्स टीम्स तैनात की जाएं, बायो-फेंसिंग मजबूत हो और जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। हाल ही में अल्मोड़ा, नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल जैसे जिलों में भालू हमलों से कई मौतें हो चुकी हैं। नवंबर 2025 में ही 9 घटनाओं में 2 लोगों की जान गई और 7 घायल हुए। गुलदारों ने ग्रामीण इलाकों में पशुओं के साथ-साथ इंसानों पर भी हमले किए। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में 50 से ज्यादा मौतें हुईं, जो पिछले साल से 30% ज्यादा हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण ने वन्यजीवों को बस्तियों की ओर धकेल दिया है।

गोदियाल ने पत्र में सुझाव दिया कि राज्य सरकार को एक ‘जिला-विशिष्ट और प्रजाति-विशिष्ट’ एक्शन प्लान बनाना चाहिए, जैसा कि वन विभाग ने 2022 में तैयार किया था। उन्होंने मांग की कि हमले में घायलों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित हो, मुआवजा राशि को तुरंत दोगुना (10 लाख से ऊपर) किया जाए और वन्यजीवों की निगरानी के लिए ड्रोन व कैमरा ट्रैप्स लगाए जाएं। गोदियाल ने कहा, “सरकार वन्यजीव संरक्षण पर जोर दे रही है, जो सराहनीय है, लेकिन इंसानी जानों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी। अगर तत्काल कदम नहीं उठे, तो ग्रामीण खुद हथियार उठाने पर मजबूर हो जाएंगे।”

मुख्यमंत्री धामी ने हाल ही में इस मुद्दे पर बैठक बुलाई थी। उन्होंने घायलों के मुफ्त इलाज का ऐलान किया और मुआवजा 5 लाख से बढ़ाकर 10 लाख रुपये करने का आदेश दिया। साथ ही, 65 क्विक रिस्पॉन्स टीम्स गठित करने और बायो-फेंसिंग लगाने के निर्देश दिए। लेकिन विपक्ष का कहना है कि ये कदम काफी नहीं, बल्कि कारणों की जांच और लंबे समय के समाधान जरूरी हैं। गोदियाल ने पत्र में CM से अपील की कि इस मुद्दे पर विधानसभा में चर्चा हो।

विपक्षी नेता ने कहा, “यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी का सवाल है। सरकार को जिम्मेदारी लेनी होगी।” विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीवों की बढ़ती आबादी (बाघों, तेंदुओं की संख्या में वृद्धि) के साथ संघर्ष बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन जागरूकता और तकनीकी हस्तक्षेप से इसे रोका जा सकता है। क्या CM धामी पत्र पर तुरंत एक्शन लेंगे? पहाड़ी जिलों में दहशत के बीच उत्तराखंड की नजरें सरकार पर टिकी हैं।

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