कर्नाटक में सियासी तूफान: कांग्रेस की कलह में भाजपा को मिल रहा अवसर?
कर्नाटक में सियासी तूफान: कांग्रेस की कलह में भाजपा को मिल रहा अवसर?
कर्नाटक की सियासत एक बार फिर उथल-पुथल की शिकार हो गई है। सत्ताधारी कांग्रेस में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सत्ता की जंग तेज हो गई है। दो साल पहले 2023 विधानसभा चुनाव में 135 सीटें जीतकर सत्ता हासिल करने वाली कांग्रेस अब आंतरिक कलह से जूझ रही है। विपक्षी भाजपा इस संकट को अपनी ताकत बनाने का सुनहरा मौका मान रही है, जहां “कांग्रेस की आपदा उसकी अवसर” साबित हो रही है।
कांग्रेस में कलह की जड़ें गहरी हैं। सत्ता संभालते ही सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच 2.5 साल का रोटेशन फॉर्मूला तय हुआ था, लेकिन नवंबर 2025 आते-आते यह विवाद भड़क उठा। शिवकुमार समर्थक विधायक दिल्ली पहुंचे, जहां उन्होंने पार्टी हाईकमान से मुलाकात की। मांग है कि सिद्धारमैया की जगह शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाए। सिद्धारमैया ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा, “मैं पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करूंगा।” उनके बेटे यथिंद्र ने तो यहां तक कह डाला कि लक्ष्मी हेब्बालकर या रामेश जारकीहोली जैसे नेता ही उत्तराधिकारी हो सकते हैं।
यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस को ऐसा संकट झेलना पड़ा। जुलाई 2024 में वल्मीकि विकास निगम घोटाले ने सरकार को हिला दिया, फिर अक्टूबर में मंत्रियों की अलग-अलग बैठकें और सार्वजनिक बयानबाजी ने हाईकमान को गुस्सा दिलाया। जनवरी 2025 में तो गैग ऑर्डर जारी करना पड़ा, जिसमें विधायकों को नेतृत्व परिवर्तन पर बोलने से रोका गया। बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद यह कलह और तेज हो गई। भाजपा नेता आर अशोक कहते हैं, “बिहार की हार ने हाईकमान को कमजोर कर दिया, अब सिद्धारमैया मजबूत हैं, लेकिन कलह बढ़ेगी।”
भाजपा इस स्थिति का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। राज्य भाजपा प्रमुख बीवाई विजयेंद्र और विपक्ष के नेता आर अशोक ने जेडीएस के साथ मिलकर कांग्रेस पर “वित्तीय कुप्रबंधन, वेतन विलंब और भ्रष्टाचार” के आरोप लगाए। पूर्व सीएम बसवराज बोम्मई ने कहा, “कांग्रेस की आंतरिक लड़ाई से प्रशासन ठप हो गया है।” भाजपा अब “ऑपरेशन कमल” की तर्ज पर विधायकों को तोड़ने की कोशिश में लगी है। लोक्सभा चुनावों में कर्नाटक में भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने 19 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 9 मिलीं। अब 2028 विधानसभा चुनावों से पहले यह कलह भाजपा के लिए वरदान साबित हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस का यह संकट विकास योजनाओं को प्रभावित कर रहा है। ग्रामीण विकास, निवेश आकर्षण और बुनियादी ढांचे पर फोकस की बजाय कुर्सी की लड़ाई हावी है। सिद्धारमैया सरकार ने गारंटी योजनाओं से वोट बटोरे, लेकिन घोटालों और कलह ने छवि खराब कर दी। हाईकमान मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल दिल्ली में मध्यस्थता कर रहे हैं, लेकिन स्रोतों के मुताबिक नवंबर के अंत तक कैबिनेट फेरबदल हो सकता है।
कर्नाटक, जो दक्षिण भारत का इकलौता राज्य है जहां भाजपा मजबूत थी, अब फिर से सियासी रणभूमि बन गया है। यदि कांग्रेस ने जल्द कलह नहीं रोकी, तो भाजपा का “अवसर” जल्द सत्ता में तब्दील हो सकता है। फिलहाल, राज्य की जनता इंतजार कर रही है कि कौन सा “क्रांति” नवंबर में आएगी – सिद्धारमैया की स्थिरता या शिवकुमार का उदय?
