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बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना को मौत की सजा: भारत की भूमिका, प्रत्यर्पण का सवाल और घटनाक्रम की पूरी कहानी

बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना को मौत की सजा: भारत की भूमिका, प्रत्यर्पण का सवाल और घटनाक्रम की पूरी कहानी

बांग्लादेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। 17 नवंबर को ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को 2024 के छात्र आंदोलन पर हिंसक दमन के लिए ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। यह सजा इन-अबसेंशिया (उनकी अनुपस्थिति में) दी गई, क्योंकि हसीना अगस्त 2024 से भारत में निर्वासन में हैं। ट्रिब्यूनल ने पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी फांसी की सजा दी, जबकि पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामुन को 5 साल की कैद। यह फैसला फरवरी 2026 के संसदीय चुनावों से ठीक पहले आया, जिससे बांग्लादेश में तनाव बढ़ गया है। हसीना की अवामी लीग पार्टी पर चुनाव लड़ने का प्रतिबंध है, और फैसले के बाद ढाका में प्रदर्शन हुए, जहां पुलिस ने हस्तक्षेप किया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल भारत पर है: क्या नई दिल्ली हसीना को प्रत्यर्पित करेगी? आइए, इस घटना के पूरे घटनाक्रम, ट्रायल की प्रक्रिया और भारत की संभावित रणनीति को विस्तार से समझें।

घटनाक्रम की शुरुआत: 2024 का छात्र आंदोलन और हसीना का पतन

शेख हसीना का राजनीतिक सफर बांग्लादेश की आजादी से जुड़ा है। वे बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं और 2009 से 2024 तक प्रधानमंत्री रहीं। उनके शासनकाल में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ने उछाल मारा—जीडीपी ग्रोथ 6-7% रही, लेकिन आरोप लगे कि यह विकास भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और लोकतंत्र की हत्या पर टिका था। ह्यूमन राइट्स वॉच और यूएन जैसे संगठनों ने उनके खिलाफ टॉर्चर, जबरन गायब करने और विपक्षी कार्यकर्ताओं की हत्याओं के दस्तावेज पेश किए।

सब कुछ जुलाई 2024 में बदल गया। सिविल सर्विस जॉब कोटे सिस्टम के खिलाफ छात्रों का शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू हुआ। हसीना सरकार ने इसे दबाने के लिए कर्फ्यू लगाया और सेना बुलाई। लेकिन आंदोलन ने रफ्तार पकड़ी—लोगों ने हसीना के इस्तीफे की मांग की। सरकारी फोर्सेस ने लाइव गोलीबारी की, जिसमें 800 से ज्यादा लोग मारे गए और 14,000 घायल हुए। यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 1,400 मौतें हुईं। 5 अगस्त 2024 को हसीना को इस्तीफा देना पड़ा। वे हेलीकॉप्टर से भागीं और भारत पहुंचीं, जहां उन्हें शरण मिली। उनके पिता के घर को तोड़ दिया गया, और अवामी लीग के नेताओं पर हमले हुए। नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी, जिसने हसीना के खिलाफ जांच का वादा किया।

ट्रायल की प्रक्रिया: वारंट से सजा तक का सफर

हसीना के पतन के बाद ट्रायल की प्रक्रिया तेजी से चली। 14 अगस्त 2024 को अंतरिम सरकार ने घोषणा की कि छात्र आंदोलन में हत्याओं के लिए ICT (जो 2010 में हसीना ने ही 1971 युद्ध अपराधों के लिए बनाया था) में मुकदमा चलेगा। अक्टूबर 2024 में ICT को पुनर्गठित किया गया। 17 अक्टूबर को हसीना और 45 अन्य अवामी लीग नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुए। नवंबर 2024 में ट्रिब्यूनल ने जांच दिसंबर तक पूरी करने का आदेश दिया।

फरवरी 2025 में यूएन रिपोर्ट ने मौतों की संख्या 1,400 बताई। जुलाई 2025 में हसीना को कोर्ट की अवमानना के लिए 6 महीने की सजा सुनाई गई। 10 जुलाई को औपचारिक आरोपपत्र दाखिल हुआ—मानवता के खिलाफ अपराध, जिसमें हत्या, टॉर्चर और तोड़फोड़ शामिल। 3 अगस्त 2025 को इन-अबसेंशिया ट्रायल शुरू हुआ। हसीना को स्टेट लॉयर दिया गया, लेकिन उन्होंने कोर्ट को ‘झूठा’ बताया। 23 अक्टूबर को सुनवाई पूरी हुई। 13 नवंबर को फैसला 17 नवंबर के लिए तय हुआ—हसीना की शादी की सालगिरह पर, जो सोशल मीडिया पर विवादास्पद रहा।

ट्रिब्यूनल ने हसीना को तीन आरोपों में दोषी ठहराया: भड़कावा, हत्या का आदेश और रोकथाम में नाकामी। जज ने कहा, “सिर्फ एक सजा: फांसी।” यूनुस सरकार ने इसे ‘ऐतिहासिक’ बताया, लेकिन शांति की अपील की। हसीना ने बयान जारी कर कहा, “यह पूर्व-निर्धारित था। अंतरिम सरकार का बदला।” उनके बेटे साजिद वाजेद ने इसे ‘मजाक’ कहा।

भारत की प्रतिक्रिया: प्रत्यर्पण का सवाल और कूटनीतिक संतुलन

फैसले के तुरंत बाद बांग्लादेश ने भारत को पत्र लिखा: “हसीना और कमाल को तुरंत सौंपें। यह द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि के तहत बाध्यता है।” विदेश मंत्री ने कहा, “शरण देना न्याय के अपमान और शत्रुता का कार्य होगा।” लेकिन भारत ने सतर्क रुख अपनाया। विदेश मंत्रालय ने कहा, “हमने फैसले का संज्ञान लिया। बांग्लादेश के लोगों के हित में—शांति, लोकतंत्र, समावेश और स्थिरता—कृतसंकल्प हैं। हम सभी हितधारकों से रचनात्मक संवाद करेंगे।”

क्यों भारत प्रत्यर्पण से हिचक रहा? 2016 की भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 5 में ‘राजनीतिक अपराध’ का क्लॉज है। अगर अपराध राजनीतिक माना जाए, तो प्रत्यर्पण रोका जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हसीना का मुकदमा राजनीतिक बदले का लगता है—ट्रायल की तेजी, बचाव में संसाधनों की कमी और अंतरिम सरकार की पूर्वाग्रह। भारत के लिए हसीना रणनीतिक सहयोगी रहीं—चीन के प्रभाव को रोकने, तीस्ता जल विवाद सुलझाने और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में। लेकिन यूनुस सरकार से संबंध खराब हैं—बांग्लादेश में भारत-विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रत्यर्पण से बांग्लादेश में अस्थिरता बढ़ सकती है, जो भारत की सीमा सुरक्षा प्रभावित करेगी।

पूर्व भारतीय हाई कमिश्नर पिनक रंजन चक्रवर्ती ने कहा, “प्रत्यर्पण की संभावना कम। भारत मानवीय आधार पर शरण देगा।” हसीना दिल्ली के एक सुरक्षित हाउस में हैं। भारत ने पहले भी राजनीतिक शरणार्थियों को संरक्षण दिया—दलाई लामा, तिब्बती। लेकिन अगर दबाव बढ़ा, तो डिप्लोमैटिक चैनलों से बातचीत हो सकती है।

व्यापक प्रभाव: बांग्लादेश की राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंध

यह सजा बांग्लादेश के लिए मील का पत्थर है। 1971 के बाद किसी पूर्व नेता को इतनी कड़ी सजा नहीं मिली। लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच ने चेतावनी दी: “ट्रायल निष्पक्ष नहीं था। अंतरिम सरकार भी राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल रही।” अगस्त 2024 से अक्टूबर 2025 तक मॉब वायलेंस में 261 मौतें हुईं। चुनावों से पहले अवामी लीग पर प्रतिबंध से हिंसा का खतरा है। हसीना के बेटे ने चेतावनी दी: “निष्पक्ष कानून लौटेगा तो यह सजा टिकेगी नहीं।”

भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर पड़ेगा। हसीना के समय व्यापार $14 बिलियन पहुंचा, लेकिन अब तनाव है। यूनुस सरकार ने भारत को ‘शत्रुता’ का आरोप लगाया। भारत को बांग्लादेश में चरमपंथी ताकतों (जैश-ए-मोहम्मद) से सतर्क रहना होगा। विशेषज्ञ इशरत हुसैन कहते हैं, “फैसला प्रत्यर्पण दबाव बढ़ाएगा, लेकिन भारत अस्वीकार कर सकता है।”

निष्कर्ष: न्याय या बदला?

शेख हसीना को सजा छात्रों के परिवारों के लिए न्याय लगती है, लेकिन हसीना इसे ‘साजिश’ मानती हैं। भारत के लिए यह कूटनीतिक दुविधा है—शरणार्थी संरक्षण बनाम पड़ोसी संबंध। फिलहाल, नई दिल्ली ‘रचनात्मक संवाद’ पर जोर दे रही। लेकिन अगर प्रत्यर्पण मांग तेज हुई, तो संबंधों में दरार पड़ सकती है। बांग्लादेश का भविष्य—चुनाव, स्थिरता और न्याय—सबकी नजरों में है। क्या यह सजा लोकतंत्र को मजबूत करेगी या नई अस्थिरता लाएगी? समय बताएगा।

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