धर्म

काल भैरव जयंती 2025: आज रौद्र रूप की आराधना, संध्या पूजन का मुहूर्त और आठ रूपों की विशेषताएं

काल भैरव जयंती 2025: आज रौद्र रूप की आराधना, संध्या पूजन का मुहूर्त और आठ रूपों की विशेषताएं

हिंदू पंचांग के अनुसार, आज मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर काल भैरव जयंती मनाई जा रही है। भगवान शिव के इस उग्र स्वरूप की पूजा से भय, दुख, नकारात्मक शक्तियां और ग्रह दोष दूर होते हैं। यह पर्व तंत्र-मंत्र साधकों के लिए विशेष महत्व रखता है, जहां काल भैरव को समय के स्वामी और अधर्म का नाशक माना जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 नवंबर रात 11:09 बजे हुई और यह आज रात 10:58 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के चलते पूजन-व्रत आज ही किया जाएगा। इस दिन व्रत रखकर भगवान की आराधना करने से सुख-समृद्धि, साहस और सुरक्षा की प्राप्ति होती है।

संध्या पूजन का शुभ मुहूर्त

काल भैरव पूजा के लिए संध्या समय सबसे पवित्र माना जाता है, जब सूर्यास्त के बाद दीपक जलाकर आरती की जाती है। 2025 के लिए निम्न मुहूर्त हैं (दिल्ली समयानुसार):

गोधूलि मुहूर्त: शाम 5:29 बजे से 5:55 बजे तक – धूल उड़ने के समय पूजन से विशेष फल।

संध्या मुहूर्त: शाम 5:29 बजे से रात 6:48 बजे तक – सरसों तेल का दीपक जलाएं।

निशिता मुहूर्त: रात 11:39 बजे से 12:32 बजे तक – रात्रि जागरण के लिए आदर्श। अन्य शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4:56 से 5:49 बजे), विजय मुहूर्त (दोपहर 1:53 से 2:36 बजे)। पूजा विधि में भगवान की प्रतिमा स्थापित कर, काले तिल, उड़द, नारियल का भोग लगाएं। मंत्र जाप: “ॐ भैरवाय नमः” 108 बार। वाहन श्वान (कुत्ता) को भोजन दान करें।

काल भैरव के आठ प्रमुख रूपों की विशेषताएं

भगवान काल भैरव के आठ रूप (अष्ट भैरव) शिव के रौद्र अवतार हैं, जो दिशाओं की रक्षा करते हैं। रुद्रयामल तंत्र में 64 रूपों का उल्लेख है, लेकिन ये आठ सर्वाधिक पूजनीय हैं:

अश्वरूड भैरव (पूर्व दिशा): घोड़े पर सवार, शत्रु नाशक। पूजा से यात्रा-सुरक्षा।

श्री भैरव (दक्षिण-पूर्व): समृद्धि प्रदाता, धन-धान्य की रक्षा। व्यापारियों के ईष्ट।

रुद्र भैरव (दक्षिण): क्रोधी स्वरूप, पाप नाशक। रोग-भय दूर करता।

काला भैरव (दक्षिण-पश्चिम): काल के स्वामी, न्याय के रक्षक। अदालती मामलों में सहायक।

स्वर्णाकर्षण भैरव (पश्चिम): सोने की आकर्षण, धन-वृद्धि। आर्थिक संकटों का हरण।

भैरव (उत्तर-पश्चिम): उग्र योद्धा, संकट मोचक। युद्ध-विवाद में विजय।

संपत्कर्ता भैरव (उत्तर): सुख-संपत्ति प्रदाता, परिवार रक्षक। गृहस्थ जीवन सुखी।

दंड भैरव (उत्तर-पूर्व): दंडकारक, अधर्म का नाश। कानून-व्यवस्था के पालक।

पौराणिक कथा और महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा के अहंकार पर क्रोधित हो शिव ने काल भैरव रूप धारण किया। ब्रह्मा का एक सिर काटकर उन्होंने अहंकार का नाश किया, लेकिन पाप लगने पर गंगा स्नान कर शुद्ध हुए। इस जयंती पर कथा पाठ से दोष निवारण होता है। तांत्रिक साधना में ये रूप नकारात्मक ऊर्जा का हरण करते हैं। शनि-राहु दोष वाले जातकों के लिए विशेष फलदायी।

इस पावन दिन पर व्रत-पूजन से जीवन में शक्ति का संचार होता है। यदि आप भी आराधना कर रहे हैं, तो सरसों तेल का अभिषेक अवश्य करें। क्या आपने आज पूजा की? कमेंट्स में शेयर करें!

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