दिल्ली में ‘जहरीली हवा’ का प्रकोप: AQI 400 पार, रेड जोन में डूबी राजधानी, स्मॉग ने मचाई तबाही
दिल्ली में ‘जहरीली हवा’ का प्रकोप: AQI 400 पार, रेड जोन में डूबी राजधानी, स्मॉग ने मचाई तबाही
राजधानी दिल्ली में सर्दी की दस्तक के साथ ही वायु प्रदूषण का कहर और तेज हो गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, शनिवार सुबह 10 बजे दिल्ली का औसत AQI 355 पर पहुंच गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। लेकिन कई इलाकों में यह 400 से ऊपर चढ़ गया, जैसे बावना में 403, आनंद विहार में 403, और वजीरपुर में 378। प्राइवेट मॉनिटरिंग एजेंसी aqi.in ने सुबह 7 बजे AQI को 566 तक बताया, जो ‘गंभीर’ या ‘हैजर्डस’ स्तर का संकेत देता है। घने स्मॉग ने विजिबिलिटी को 50 मीटर तक घटा दिया, जिससे सड़कों पर ट्रैफिक जाम और हादसे बढ़ गए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह हवा सांस लेना मुश्किल बना रही है, खासकर बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा रोगियों के लिए।
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 15 नवंबर से 15 फरवरी तक सरकारी दफ्तरों और MCD के लिए स्टैगर्ड टाइमिंग लागू की – सरकारी कर्मचारियों का समय 10 बजे से 6:30 बजे तक, जबकि MCD का 8:30 से 5 बजे तक। ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के स्टेज-2 के तहत कंस्ट्रक्शन साइट्स पर सख्ती, पेट्रोल-डीजल वाहनों पर पाबंदी और वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये उपाय अपर्याप्त हैं। दिल्ली के 2 लाख से अधिक निवासी 2022-2024 में प्रदूषण से अस्पताल पहुंचे, और इस साल भी संख्या बढ़ रही है।
प्रदूषण के मुख्य कारणों में पराली जलाना, वाहनों का धुआं, इंडस्ट्री और कंस्ट्रक्शन धूल शामिल हैं। पंजाब में सैकड़ों फसल अवशेष जलाए गए, जिससे हवा में PM2.5 का स्तर 373 माइक्रोग्राम/घन मीटर (WHO लिमिट से 25 गुना अधिक) पहुंच गया। NCR के अन्य शहर भी प्रभावित हैं – नोएडा का AQI 380, गुरुग्राम 366। मौसम विभाग ने बताया कि सुबह 11 डिग्री तापमान के साथ शैलो फॉग रहा, और अगले कुछ दिनों तक AQI ‘बहुत खराब’ रहेगा।
विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा, “GRAP सिर्फ कागजों पर है, अमल नहीं।” स्वास्थ्य मंत्रालय ने हेल्पलाइन 1800-11-4403 जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसी हवा से फेफड़ों की क्षति, हार्ट अटैक और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। दिल्ली को बचाने के लिए अब राष्ट्रीय स्तर पर ठोस कदम जरूरी हैं – वरना यह ‘गैस चैंबर’ बन जाएगी।
