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सौभाग्य सुंदरी तीज व्रत 2025: अखंड सौभाग्य की कामना, जानें शुभ तिथि, महत्व और पूजन विधि

सौभाग्य सुंदरी तीज व्रत 2025: अखंड सौभाग्य की कामना, जानें शुभ तिथि, महत्व और पूजन विधि

हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए सौभाग्य सुंदरी तीज व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है, जो सुखी दांपत्य जीवन, अखंड सौभाग्य और परिवार की समृद्धि की कामना करता है। इस वर्ष यह पावन व्रत 8 नवंबर 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि 7 नवंबर की शाम से शुरू होकर 8 नवंबर को समाप्त होगी, इसलिए उदय तिथि के आधार पर पूजन 8 नवंबर को ही किया जाएगा। सुहागिनें इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करती हैं।

सौभाग्य सुंदरी तीज का महत्व

यह व्रत वैवाहिक जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने और पति-पत्नी के बीच प्रेम व समृद्धि बढ़ाने के लिए जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत से मांगलिक दोष कम होता है, विवाह में रुकावटें समाप्त होती हैं और संतान सुख प्राप्त होता है। कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए, जबकि सुहागिनें पति की लंबी आयु और सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनके समर्पण से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अर्धांगिनी का वरदान दिया। इसी कथा से प्रेरित होकर महिलाएं इस व्रत का पालन करती हैं, जिससे दांपत्य जीवन में सौहार्द बना रहता है। ज्योतिषियों का मानना है कि यह व्रत दुर्गा और शिव की कृपा से सौंदर्य, सौभाग्य और सुख प्रदान करता है।

पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

सौभाग्य सुंदरी तीज की पूजा सरल लेकिन विधि-पूर्वक की जाती है। निम्नलिखित तरीके से पूजन करें:

स्नान और शृंगार: प्रातःकाल उठकर स्नान करें। सोलह श्रृंगार करें—मेहंदी, कुमकुम, आलता, सिंदूर, बिंदी, काजल, चूड़ियां आदि लगाएं। स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

पूजन सामग्री: भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मूर्ति या चित्र। फल, मिठाई, दूध, दही, पान, सुपारी, चंदन, कुमकुम, अगरबत्ती, दीपक, कलावा, सिंदूर, बेलपत्र, धतूरा, भांग, जल, दान-पत्र।

पूजन प्रक्रिया:

सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें।

फिर नवग्रहों का स्मरण करें।

शिव-पार्वती की मूर्ति को लाल वस्त्र पर स्थापित करें। चंदन, कुमकुम, फूल चढ़ाएं।

माता पार्वती का सोलह श्रृंगार करें—सिंदूर, काजल आदि अर्पित करें।

बेलपत्र, धतूरा, भांग चढ़ाकर अभिषेक करें। आरती उतारें।

व्रत कथा पढ़ें या सुनें, जिसमें पार्वती के तप की चर्चा हो।

रात्रि में जागरण करें, भजन-कीर्तन करें।

शुभ मुहूर्त: अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 11:50 से 12:40 बजे) या मध्याह्न काल सर्वोत्तम। पूजा प्रातःकाल से मध्याह्न तक करें। व्रत अगले दिन पारण (उपवास तोड़ना) करें।

दान: पूजा के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन, वस्त्र, फल दान करें। इससे व्रत का फल बढ़ता है।

यह व्रत न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक महत्व रखता है, जो महिलाओं को सशक्त बनाता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो तो चिकित्सक से परामर्श लें। इस व्रत से जीवन में सुख-शांति की बहार आती है।

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