उत्तराखंड कांग्रेस में ब्राह्मण नेतृत्व की बहस: हरीश रावत का बयान और सियासी हलचल
उत्तराखंड कांग्रेस में ब्राह्मण नेतृत्व की बहस: हरीश रावत का बयान और सियासी हलचल
बीते दिनों उत्तराखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के एक बयान ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी। राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम के दौरान हरीश रावत ने ब्राह्मण समुदाय को कांग्रेस में नेतृत्व सौंपने की वकालत की, जिससे कई सियासी सर्कल में चर्चाएं तेज हो गईं। कार्यक्रम में भाजपा नेता विनोद चमोली के साथ मंच साझा करने के बाद रावत ने कहा कि वे चमोली को शुरू से ही योग्य मानते हैं, लेकिन भाजपा उन्हें नजरअंदाज कर रही है। बीच में कांग्रेस से भाजपा गए किशोर उपाध्याय ने हस्तक्षेप किया और रावत पर भाजपा में फूट डालने का आरोप लगाया, तो रावत ने हंसते हुए उपाध्याय को भी योग्य बताकर माहौल हल्का कर दिया। बाद में पत्रकारों से बातचीत में रावत ने स्पष्ट किया कि उनका बयान ब्राह्मणों की उदारता और सहिष्णुता पर आधारित है, जो सनातन धर्म और कांग्रेस की विचारधारा से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा, “ब्राह्मण कांग्रेस और सनातन से निकले हैं; वे उदार और सहिष्णु होते हैं। महात्मा गांधी ने कांग्रेस को सनातन मूल्यों का प्रतिबिंब बनाया था। सनातन, ब्राह्मण और कांग्रेस का समन्वय देश को मजबूत बनाता है, और यह उत्तराखंड से फिर शुरू हो।”
इस बयान को कई लोग रावत का गणेश गोदियाल (ब्राह्मण समुदाय से) को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का इशारा मान रहे हैं, जो पहले भी रावत के करीबी रहे हैं। यह बयान एक तीर से कई निशाने साधने वाला लग रहा है—एक ओर भाजपा में ब्राह्मण नेताओं (जैसे विनोद चमोली) की उपेक्षा पर तंज, तो दूसरी ओर कांग्रेस में जातिगत संतुलन की मांग। रावत ने सैद्धांतिक रूप से जोर दिया कि ब्राह्मणों के कांग्रेस छोड़ने से पार्टी कमजोर हुई या कांग्रेस के छोड़ने से ब्राह्मण—यह बहस जरूरी है, खासकर जब देश असहिष्णुता की दिशा में बढ़ रहा हो। उन्होंने जातिवाद के आरोपों पर पलटवार किया, “मैं जातिवाद नहीं फैला रहा; एक ब्राह्मण की पैरवी कर रहा हूं, इसमें जातिवाद कहां है? यह सनातन से कांग्रेस तक का विचार है।”
भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने रावत से बयान स्पष्ट करने को कहा, “वे बताएं कि ब्राह्मणों को नेतृत्व क्यों दिया जाए?” आलोचकों ने इसे जातिवादी करार दिया, लेकिन रावत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि कुछ नेता कांग्रेस की ‘डीएनए’ नहीं समझते, वे राज्य आंदोलन के समर्थक नहीं थे। यह बयान 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की रणनीति को दर्शाता है, जहां जातिगत समीकरण महत्वपूर्ण हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तराखंड में हिंदू 82.97%, मुस्लिम 13.95%, सिख 2.34%, ईसाई 0.37%, बौद्ध 0.15%, जैन 0.09% और अन्य 0.87% हैं। जातिगत रूप से, ठाकुर (क्षत्रिय) लगभग 35%, ब्राह्मण 27%, एससी 18.76%, ओबीसी 15.6%, एसटी 2.89% और अन्य 0.75% हैं। इन आंकड़ों के बीच ब्राह्मण-ठाकुर समीकरण सियासत का केंद्र बने रहते हैं, और रावत का बयान इसी को मजबूत करने की कोशिश लगता है। यह विवाद उत्तराखंड के सियासी गलियारों में लंबे समय तक गूंज सकता है।
