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​काशी विश्वनाथ में ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’: संस्कृति और विज्ञान का संगम

​काशी विश्वनाथ में ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’: संस्कृति और विज्ञान का संगम

​वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थापित विक्रमादित्य वैदिक घड़ी ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान भारत की प्राचीन समय-गणना पद्धति की ओर खींचा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया वाराणसी दौरे के दौरान इस घड़ी का बारीकी से अवलोकन किया और इसकी कार्यप्रणाली को समझा।

​पीएम मोदी का अवलोकन और महत्व

​प्रधानमंत्री मोदी भारतीय सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान परंपरा के प्रबल पक्षधर रहे हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर में इस घड़ी को बाबा विश्वनाथ को समर्पित किया गया है। पीएम द्वारा इसका अवलोकन करना इस बात का संकेत है कि भारत अपनी प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों को आधुनिक युग में फिर से प्रतिष्ठित कर रहा है।

​स्थापना का घटनाक्रम

​उपहार: यह घड़ी 3 अप्रैल 2026 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेंट की गई थी।

​स्थापना: इसे 4 अप्रैल 2026 को काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थापित किया गया।

​पृष्ठभूमि: उज्जैन (महाकालेश्वर) के बाद काशी देश का दूसरा ऐसा प्रमुख ज्योतिर्लिंग स्थल है जहाँ यह घड़ी लगाई गई है।

​क्या है विक्रमादित्य वैदिक घड़ी?

​यह घड़ी सामान्य घड़ियों से पूरी तरह भिन्न है। इसे महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, उज्जैन द्वारा विकसित किया गया है।

​आधार: यह सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के समय चक्र पर आधारित है।

​लोकार्पण: इस अवधारणा का सबसे पहले लोकार्पण वर्ष 2024 में उज्जैन में पीएम मोदी ने ही किया था।

​वैदिक समय प्रणाली का गणित

​सामान्य घड़ी जहाँ 24 घंटे के चक्र पर चलती है, वहीं वैदिक घड़ी दिन को 30 मुहूर्तों में विभाजित करती है:

​दिन का विभाजन: सूर्योदय से सूर्यास्त तक 15 मुहूर्त और सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक 15 मुहूर्त।

​समय की इकाइयाँ: * 1 मुहूर्त = लगभग 48 मिनट (स्थिर नहीं, स्थान और सूर्योदय के अनुसार परिवर्तनशील)।

​1 मुहूर्त = 30 कला।

​1 कला = 30 काष्ठा।

​1 काष्ठा = 3.2 सेकंड।

​यह गणना सूर्य के कोण और भौगोलिक स्थिति के अनुसार बदलती रहती है, जिससे यह प्रकृति के साथ पूरी तरह तालमेल बिठाती है।

​एक घड़ी, अनेक जानकारियां

​यह घड़ी केवल ‘समय’ का यंत्र नहीं, बल्कि एक डिजिटल पंचांग की तरह कार्य करती है। इसमें निम्नलिखित जानकारी प्रदर्शित होती है:

​वैदिक समय और भारतीय मानक समय (IST)।

​वर्तमान स्थान (Location)।

​तिथि, नक्षत्र, योग और करण।

​विक्रम संवत का महीना, सूर्य और चंद्र की राशि।

​ग्रहों की स्थिति और शुभ मुहूर्त।

​क्यों इसे ‘भारत का स्वाभिमान’ कहा जा रहा है?

​विशेषज्ञों के अनुसार, यह घड़ी भारत की उस वैज्ञानिक सोच का प्रतीक है जो हजारों साल पहले ही समय की सूक्ष्म गणना करने में सक्षम थी।

​सांस्कृतिक पुनर्जागरण: काशी में इसकी स्थापना भारतीय ज्ञान परंपरा को युवाओं तक पहुँचाने का एक जरिया है।

​भावी योजनाएं: मध्य प्रदेश सरकार की योजना के अनुसार, भविष्य में अयोध्या के राम मंदिर और देश के अन्य सभी ज्योतिर्लिंगों पर भी ऐसी ही वैदिक घड़ियाँ स्थापित की जाएंगी।

​निष्कर्ष: विक्रमादित्य वैदिक घड़ी प्राचीन वैदिक काल की शुद्धता और आधुनिक तकनीक का एक अद्भुत मेल है, जो समय को केवल मशीनी नहीं बल्कि प्राकृतिक नजरिए से देखने का अवसर प्रदान करती है।

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