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डोनाल्ड ट्रंप के न्यूक्लियर टेस्टिंग बयान से वैश्विक हलचल: अमेरिका ने 33 साल बाद फिर शुरू करने का आदेश दिया

डोनाल्ड ट्रंप के न्यूक्लियर टेस्टिंग बयान से वैश्विक हलचल: अमेरिका ने 33 साल बाद फिर शुरू करने का आदेश दिया

30 अक्टूबर 2025 को दक्षिण कोरिया के बुसान में एशिया-प्रशांत इकोनॉमिक कोऑपरेशन (APEC) समिट के दौरान, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाले बयान में पेंटागन को निर्देश दिया कि अमेरिका तुरंत न्यूक्लियर हथियारों का टेस्टिंग शुरू करे। यह फैसला 1992 के बाद पहली बार होगा, जब अमेरिका ने वॉलंटरी मोरेटोरियम (रोक) लगा दिया था। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा, “अन्य देशों के टेस्टिंग प्रोग्राम्स की वजह से, मैंने डिपार्टमेंट ऑफ वॉर (डिफेंस) को निर्देश दिया है कि हमारे न्यूक्लियर हथियारों का टेस्टिंग ‘इक्वल बेसिस’ पर तुरंत शुरू हो।” यह बयान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने से ठीक पहले आया, जिससे व्यापार वार्ताओं का माहौल और तनावपूर्ण हो गया।

बयान का बैकग्राउंड और कारण

ट्रंप का यह कदम रूस के हालिया न्यूक्लियर-पावर्ड हथियारों के टेस्ट्स के जवाब में आया है। 21 अक्टूबर को रूस ने न्यूक्लियर-पावर्ड क्रूज मिसाइल का टेस्ट किया, 22 को न्यूक्लियर रेडीनेस ड्रिल्स आयोजित कीं, और 28 को न्यूक्लियर-पावर्ड ऑटोनॉमस टॉरपीडो का परीक्षण किया। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका के पास दुनिया में सबसे ज्यादा न्यूक्लियर हथियार हैं (हालांकि वास्तव में रूस के पास ज्यादा हैं), और चीन 5 साल में बराबरी कर लेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका को “पीस थ्रू स्ट्रेंथ” (शक्ति से शांति) के लिए यह जरूरी है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि रूस और चीन ने 1996 के बाद फुल न्यूक्लियर डेटोनेशन टेस्ट नहीं किए हैं—ट्रंप का दावा गलत प्रतीत होता है।

यह बयान न्यूक्लियर आर्म्स कंट्रोल पर भी असर डालेगा। न्यू स्टार्ट ट्रीटी (अमेरिका-रूस के बीच आखिरी बड़ा न्यूक्लियर एग्रीमेंट) फरवरी 2026 में खत्म हो रही है, और यह कदम आर्म्स रेस को नई जिंदगी दे सकता है।

वैश्विक प्रतिक्रियाएं: चिंता और आलोचना की बाढ़

ट्रंप के बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है। यहां मुख्य प्रतिक्रियाएं:

रूस: क्रेमलिन स्पोक्सपर्सन दिमित्री पेस्कोव ने कहा, “हमें नहीं पता कि कोई टेस्टिंग कर रहा है, लेकिन अगर मोरेटोरियम तोड़ा गया, तो रूस उसी तरह जवाब देगा।” राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पहले ही चेतावनी दी थी कि वे “सॉवरेन डिसीजन” का सम्मान करेंगे लेकिन जवाबी कार्रवाई करेंगे।

चीन: शी जिनपिंग के साथ बैठक के दौरान यह मुद्दा उठा। चीनी मीडिया ने इसे “प्रोवोकेटिव” बताया, और विशेषज्ञों का कहना है कि इससे चीन अपना न्यूक्लियर आर्सेनल (जो 2023 में 410 तक पहुंच चुका है) तेजी से बढ़ाएगा।

अमेरिकी आलोचक: डेमोक्रेट्स और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स ने इसे “खतरनाक” करार दिया। न्यू यॉर्क टाइम्स के अनुसार, यह कोल्ड वॉर जैसी बहस को जिंदा कर देगा। नेवाडा की कांग्रेसवुमन डिना टाइटस ने बिल पेश करने की घोषणा की टेस्टिंग रोकने के लिए। कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट कहती है कि फुल टेस्ट के लिए 24-36 महीने लगेंगे, और नेवाडा साइट पर उपकरण पुराने हो चुके हैं।

अन्य देश: ब्रिटेन, फ्रांस और जापान जैसे सहयोगी चिंतित हैं। अल जजीरा के अनुसार, यह नॉर्थ कोरिया जैसे देशों को भी उकसा सकता है, जो 2017 के बाद चुप हैं। नोबेल पीस प्राइज की दौड़ में ट्रंप के दावे पर सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई, जैसे “पीस प्रेसिडेंट?”।

एक्स (पूर्व ट्विटर) पर भी बहस छिड़ी है। यूजर्स ट्रंप को “पीस प्रेसिडेंट” बताते हुए व्यंग्य कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे “स्ट्रॉन्ग लीडरशिप” बता रहे हैं। एक पोस्ट में कहा गया, “ट्रंप ने न्यूक्लियर टेस्टिंग रिज्यूम करने का आदेश दिया—30 साल बाद पहली बार!”

क्या होगा आगे? संभावित प्रभाव

तकनीकी चुनौतियां: अमेरिका के पास नेवाडा नेशनल सिक्योरिटी साइट है, लेकिन अंडरग्राउंड टेस्ट्स के लिए तैयारी में साल लग सकते हैं। एनर्जी डिपार्टमेंट (न कि डिफेंस) जिम्मेदार है, जिससे कन्फ्यूजन है।

पर्यावरण और सुरक्षा: टेस्टिंग से रेडिएशन रिस्क बढ़ेगा, और CTBT (कॉम्प्रिहेंसिव न्यूक्लियर-टेस्ट-बैन ट्रीटी) का उल्लंघन होगा, जो अमेरिका ने साइन तो किया लेकिन रैटिफाई नहीं।

भू-राजनीतिक: इससे US-चीन ट्रेड डील प्रभावित हो सकती है, और ईरान जैसे देशों पर दबाव बढ़ेगा (ट्रंप ने पहले ही ईरान को न्यूक्लियर रिन्यूअल पर चेतावनी दी है)।

ट्रंप का यह बयान उनकी “अमेरिका फर्स्ट” पॉलिसी का हिस्सा लगता है, लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि इससे दुनिया कम सुरक्षित हो जाएगी।

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