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तुलसी विवाह 2025: 2 या 3 नवंबर कब है? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

तुलसी विवाह 2025: 2 या 3 नवंबर कब है? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक तुलसी विवाह (Tulsi Vivah) का उत्साह पूरे देश में व्याप्त है। यह पर्व भगवान विष्णु (शालिग्राम रूप में) और तुलसी माता के पवित्र विवाह का प्रतीक है। इस साल तुलसी विवाह की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं में थोड़ी दुविधा है—क्या यह 2 नवंबर को है या 3 नवंबर को? पंचांग के अनुसार, तुलसी विवाह मुख्य रूप से 2 नवंबर 2025 (रविवार) को मनाया जाएगा। द्वादशी तिथि 2 नवंबर को प्रारंभ होकर 3 नवंबर की सुबह तक रहेगी, लेकिन अधिकांश ज्योतिषियों और पंचांगों के अनुसार पूजा-अनुष्ठान 2 नवंबर को ही शुभ माने जाते हैं। आइए जानें विस्तार से सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व के बारे में।

तुलसी विवाह 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त

– तिथि: कार्तिक शुक्ल द्वादशी, 2 नवंबर 2025 (रविवार)।

द्वादशी तिथि का प्रारंभ: 2 नवंबर 2025 को सुबह 07:30 बजे।

द्वादशी तिथि का समापन: 3 नवंबर 2025 को प्रातः 05:06 बजे।

(नोट: कुछ क्षेत्रीय पंचांगों में 3 नवंबर को भी पूजा की अनुमति है, लेकिन उत्तर भारतीय परंपरा में 2 नवंबर को ही प्रमुखता दी जाती है।)

– शुभ विवाह मुहूर्त:

– अभिजीत मुहूर्त: 2 नवंबर को दोपहर 11:46 बजे से 12:36 बजे तक।

– मध्याह्न पूजा मुहूर्त: सुबह 10:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक (सामान्य पूजा के लिए सबसे शुभ)।

– सायाह्न पूजा मुहूर्त: शाम 04:00 बजे से 06:00 बजे तक (विवाह अनुष्ठान के लिए आदर्श)।

(ये मुहूर्त दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत के लिए हैं; स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।)

यह पर्व देवउठनी एकादशी (1 नवंबर 2025) के अगले दिन आता है, जब भगवान विष्णु चार मास की योग निद्रा से जागते हैं और शुभ कार्यों का शुभारंभ होता है।

तुलसी विवाह की पूजा विधि (सरल तरीके से)

तुलसी विवाह की पूजा घर पर ही की जाती है। निम्नलिखित सामग्री एकत्र करें: तुलसी पौधा, शालिग्राम/विष्णु मूर्ति, हल्दी-कुमकुम, फूल-माला, दीपक, अगरबत्ती, मिठाई (प्रसाद), पीले वस्त्र, थाली और मंगल कलश।

1. संकल्प और शुद्धिकरण: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-5 बजे) में स्नान कर व्रत का संकल्प लें। तुलसी पौधे को मंडप (टॉर्च या फूलों से सजाया हुआ) में स्थापित करें।

2. पूजन: तुलसी को लाल चुनरी ओढ़ाएं, शालिग्राम को पीले वस्त्र पहनाएं। गणेश-लक्ष्मी पूजन के बाद तुलसी-शालिग्राम का विवाह कराएं। मंत्र जपें: “ॐ तुलसी कृष्ण प्रेमी व्रतं करिष्ये।”

3. फेरे और कन्यादान: 7 फेरे लवंग मालाएं (तुलसी पत्ती की माला) का आदान-प्रदान करें। कन्यादान के रूप में तुलसी को दान दें।

4. आरती और प्रसाद: दीप आरती करें और गुड़-चने का प्रसाद वितरित करें। रात को तुलसी मंडप में ही भोजन करें।

तुलसी विवाह का धार्मिक महत्व

तुलसी विवाह का पौराणिक आधार वृंदा (तुलसी का अवतार) और भगवान विष्णु की कथा से जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार, राक्षस जालंधर की पत्नी वृंदा के पतिव्रत धर्म के कारण देवता पराजित हो रहे थे। विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा का सतीत्व भंग किया, जिससे जालंधर का वध हुआ। क्रोधित वृंदा ने विष्णु को श्राप दिया, लेकिन बाद में क्षमा मांगते हुए वह तुलसी रूप में स्थापित हुईं। इस विवाह से विष्णु और तुलसी का शाश्वत प्रेम जुड़ा।

– आध्यात्मिक लाभ: यह पर्व दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि लाता है। तुलसी को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, इसलिए पूजा से धन-धान्य की प्राप्ति होती है। पाप नाश, मोक्ष प्राप्ति और वैवाहिक बाधाओं का निवारण होता है।

– सांस्कृतिक महत्व: यह हिंदू शादियों के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। घर में सुख-शांति बनी रहती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

तुलसी विवाह न केवल धार्मिक, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह तुलसी के पौधे की पूजा को प्रोत्साहित करता है। इस बार पर्व को भव्यता से मनाएं और परिवार के साथ आस्था का लाभ उठाएं।

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