पाकिस्तान और तालिबान के जानी दुश्मन बनने की कहानी: दोस्ती से दुश्मनी का सफर
पाकिस्तान और तालिबान के जानी दुश्मन बनने की कहानी: दोस्ती से दुश्मनी का सफर
कभी पाकिस्तान की गोद में पले-बढ़े तालिबान आज उसके सबसे बड़े सिरदर्द बन चुके हैं। अफगानिस्तान में तालिबान की 2021 में सत्ता हथियाने के बाद रिश्तों में आई दरार अब खुली जंग में बदल चुकी है। दुरंध लाइन पर गोलीबारी, हवाई हमले और टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) की बढ़ती कार्रवाइयां—यह सब बताता है कि पूर्व सहयोगी अब खुला दुश्मन हैं। 2024-25 में तनाव चरम पर पहुंचा, जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में ड्रोन हमले किए और तालिबान ने जवाबी कार्रवाई की। आइए, जानते हैं इस दुश्मनी की पूरी कहानी।
दोस्ती की शुरुआत: 1990 का दशक
पाकिस्तान ने तालिबान को अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ के तौर पर देखा। 1990 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध के बाद अफगानिस्तान में अराजकता फैली। पाकिस्तान की आईएसआई ने तालिबान को हथियार, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया, ताकि काबुल में अपना कठपुतली शासन बने। 1996 में तालिबान ने काबुल फतह किया, और पाकिस्तान एकमात्र देश था जिसने इसे मान्यता दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था, “तालिबान हमारा भाई है।” इस समर्थन से पाकिस्तान को अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को रोकने का फायदा मिला। लेकिन यह दोस्ती एकतरफा थी—तालिबान ने कभी पाकिस्तान के हितों को प्राथमिकता नहीं दी।
आईएसआई का दोहरा खेल: 2001 के बाद
9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को ‘आतंकवाद के खिलाफ जंग’ में शामिल किया। राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने तालिबान को छोड़ दिया, लेकिन गुप्त रूप से समर्थन जारी रखा। आईएसआई ने हक्कानी नेटवर्क जैसे गुटों को शरण दी। इसी बीच, पाकिस्तान के आदिवासी इलाकों (एफएटीए) में टीटीपी उभरा। 2007 में बैतुल्लाह मेहसूद ने टीटीपी बनाया, जो अफगान तालिबान से प्रेरित था लेकिन पाकिस्तान-विरोधी। टीटीपी ने लाहौर पुलिस अकादमी (2009) जैसे हमलों से हजारों पाकिस्तानियों की जान ली। पाकिस्तान ने 2014-17 में ऑपरेशन जर्द-ए-अजब और रद्द-उल-फसाद से टीटीपी को कुचला, लेकिन बचे लड़ाके अफगानिस्तान भाग गए।
2021 का टर्निंग पॉइंट: तालिबान की जीत और पाकिस्तान की भूल
अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान ने अगस्त 2021 में काबुल कब्जा लिया। पाकिस्तान ने इसे अपनी ‘विजय’ माना—सेना प्रमुख बाजवा ने कहा, “हमारा सपना साकार हुआ।” उम्मीद थी कि तालिबान टीटीपी पर कार्रवाई करेगा। लेकिन उलटा हुआ। तालिबान ने टीटीपी कैदियों को रिहा किया, उन्हें शरण दी और हक्कानी नेटवर्क ने उनकी मदद की। टीटीपी ने तालिबान को ‘वफादारी’ की शपथ दी। 2022 में सीजफायर टूटा, और टीटीपी ने पाकिस्तानी सेना पर हमले तेज कर दिए। 2024 में 521 हमले हुए—70% की बढ़ोतरी।
दुश्मनी का चरम: 2024-25 की जंग
2024 के अंत से तनाव भड़का। दिसंबर में पाकिस्तान ने पक्तिका में टीटीपी ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसमें तालिबान ने 46 नागरिकों (महिलाएं-बच्चे) की मौत का दावा किया। तालिबान ने जवाब में दुरंध लाइन पर पाकिस्तानी चेकपोस्ट्स पर हमला किया—21 पोस्ट्स कब्जे में। जनवरी 2025 में खोस्त में मोर्टर हमले हुए, और तालिबान ने उत्तर वजीरिस्तान में संयुक्त हमला किया। अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान ने काबुल और खोस्त में ड्रोन स्ट्राइक्स किए, जिसमें टीटीपी सरगना नूर वली मेहसूद को निशाना बनाया गया। तालिबान ने कहा, “यह संप्रभुता का उल्लंघन है।” सीमा पर गोलीबारी से दर्जनों मारे गए, और टोर्कहम गेट बंद हो गया।
पाकिस्तान का आरोप: तालिबान टीटीपी को हथियार और ट्रेनिंग दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने भी तालिबान पर टीटीपी को सपोर्ट का इल्जाम लगाया। तालिबान इनकार करता है, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि हक्कानी परिवार के पुराने रिश्ते टीटीपी से हैं। दुरंध लाइन विवाद ने आग में घी डाला—तालिबान इसे ‘ब्रिटिश काल की रेखा’ मानता है।
क्यों बिगड़े रिश्ते?
पाकिस्तान की भूल थी तालिबान को ‘कठपुतली’ समझना। तालिबान अब स्वतंत्र है—वह पाकिस्तान की बजाय अपनी ‘इस्लामी अमीरात’ की रक्षा करता है। टीटीपी को दबाने से आंतरिक विद्रोह भड़क सकता है। 2025 में हमलों की संख्या 2024 से ज्यादा हो चुकी। पाकिस्तान अब डोनाल्ड ट्रंप से मध्यस्थता मांग रहा है, लेकिन तालिबान भारत से करीब आ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘नया सामान्य’ है। पूर्व राजदूत मल्होत्रा ने कहा, “पाकिस्तान की नीति उलटी पड़ी।” सीमा पर तैनाती बढ़ी, लेकिन शांति दूर। क्या यह जंग पूर्ण युद्ध बनेगी? फिलहाल, दोनों तरफ मौत का सिलसिला जारी है।
