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कल के महात्मा आज मीम्स बनकर रह गए: क्यों हो गया गांधी जी का ‘मेमीफिकेशन’?

कल के महात्मा आज मीम्स बनकर रह गए: क्यों हो गया गांधी जी का ‘मेमीफिकेशन’?

आज 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर देशभर में श्रद्धांजलि दी गई, लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ और ही तमाशा हो रहा था। गांधी जी के चश्मे-धारी चित्र से लेकर ‘हे राम’ वाले मीम्स तक, इंटरनेट यूजर्स ने उन्हें हास्य का केंद्र बना दिया। एक तरफ दशहरा का संयोग था, जहां रावण दहन के साथ गांधी जयंती का ‘कॉलेब’ हो गया, तो दूसरी तरफ पुराने विवादों को हवा मिली। सवाल उठता है – जो महात्मा कभी स्वराज का प्रतीक थे, आज क्यों मीम्स की भेंट चढ़ गए? क्या यह सांस्कृतिक विडंबना है, या डिजिटल युग की मजबूरी?

इस साल का 2 अक्टूबर खास था। गांधी जयंती और दशहरा एक ही दिन पड़ने से छुट्टियों का ‘कॉलेब’ हो गया – जहां आमतौर पर दो अलग-अलग छुट्टियां मिलती हैं, वहां सिर्फ एक। नतीजा? मीम्स का तूफान। ट्विटर (अब X) पर #GandhiJayanti और #Dussehra2025 ट्रेंड करने लगे, जहां यूजर्स ने चुटकी ली, “एक छुट्टी खा गया ये कॉलेब!” या “रावण जल रहा है, लेकिन गांधी जी की छुट्टी भी उड़ गई।” एक यूजर ने लिखा, “नारायण मूर्ति खुश होंगे, क्योंकि कॉर्पोरेट वालों को सिर्फ एक ही छुट्टी मिली।” नरेंद्र मूर्ती के 70 घंटे काम के वाले बयान को जोड़कर मीम्स बनाए गए, जहां गांधी जी को ‘नॉन-वायलेंट वर्कहॉलिक’ दिखाया गया।

लेकिन मीम्स सिर्फ छुट्टियों तक सीमित नहीं रहे। दशहरा के रावण दहन ने गांधी जी को निशाने पर ले लिया। एक वायरल मीम में रावण के पुतले के साथ गांधी जी का चित्र जोड़कर लिखा गया, “रावण vs गांधी: दोनों का आखिरी शब्द ‘हे राम’!” या “गांधी जी नॉन-वायलेंस सिखाते थे, लेकिन आज रावण दहन में हिंसा हो रही है।” कुछ मीम्स में उन्हें ‘बर्थडे बम्स’ कहा गया, जहां उनके ब्रह्मचर्य प्रयोगों या हिटलर को पत्र लिखने जैसे विवादास्पद पहलुओं को चुटकी में पिरोया गया। X पर एक पोस्ट में लिखा, “गांधी जी इतने ग्रेट हैं कि लोग उन पर मीम्स बनाते हैं, लेकिन टॉप पर बने रहते हैं।” दूसरी तरफ, कुछ यूजर्स ने इसे ‘हेटफुल प्रोपगैंडा’ करार दिया, जहां गांधी जी को रावण और नाथूराम गोडसे को राम दिखाया जा रहा है।

यह ‘मेमीफिकेशन’ नई नहीं है। डिजिटल युग में गांधी जी जैसे ऐतिहासिक नायक इन्फोग्राफिक्स और मीम्स में सिमट गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख में कहा गया, “21वीं सदी के डिजिटल थिएटर में इतिहास के दिग्गजों को सरलीकृत कर दिया जाता है। उनकी जिंदगी शेयर करने लायक इमेजेस में बदल जाती है।” गांधी जी की नॉन-वायलेंस और सत्याग्रह जैसी फिलॉसफी को मीम्स में ‘ओवररेटेड’ या ‘हाइप’ बता दिया जाता है। कुछ मीम्स में उन्हें ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ कहा गया, जबकि अन्य में सावरकर या बोस से तुलना की गई। X पर एक यूजर ने लिखा, “गांधी जी ने देश को आजादी दी, लेकिन आज मीम्स में उनकी बलि चढ़ रही है।”

क्यों हो रहा है ऐसा? विशेषज्ञों का मानना है कि मीम कल्चर में गांधी जी का ‘डार्क साइड’ आसानी से फिट हो जाता है। उनके ब्रह्मचर्य प्रयोग, हिटलर को पत्र, या मोपला दंगे में हिंदुओं को ‘आत्महत्या’ की सलाह जैसे विवादास्पद फैसले मीम्स का फ्यूल बन जाते हैं। एक थ्रेड में लिखा गया, “गांधी जी का प्राइवेट लाइफ डार्क था – सेक्स बिलीफ्स से लेकर हिटलर को ‘डियर फ्रेंड’ कहना तक।” दक्षिण अफ्रीका में ब्लैक्स के प्रति रेसिस्ट रवैया या कास्टिज्म पर भी मीम्स बनते हैं। लेकिन विपरीत रूप से, यही विविधता उन्हें अमर बनाती है। नेल्सन मंडेला से लेकर मार्टिन लूथर किंग तक, दुनिया भर में उनकी मूर्तियां हैं। X पर एक पोस्ट में कहा गया, “गांधी जी ने नॉन-वायलेंस को हथियार बनाया, जो आज भी काम करता है।”

राजनीतिक कोण से देखें तो RSS के 100 साल पूरे होने पर भी गांधी जी की हत्या का जिक्र चुभता है। कुछ मीम्स में गोडसे को ‘हीरो’ दिखाया जा रहा है, जो प्रोपगैंडा का रूप ले लेता है। लेकिन सच्चाई यह है कि गांधी जी ने भारत को एकजुट किया – सॉल्ट मार्च से लेकर हिंदू-मुस्लिम यूनिटी तक। आज मीम्स उन्हें छोटा दिखाते हैं, लेकिन उनकी विरासत – स्वराज, अहिंसा – आज भी जीवित है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, “गांधी जैसे व्यक्ति का जन्म सदियों में एक बार होता है।”

मीम्स हंसाते हैं, लेकिन सोचने पर मजबूर भी करते हैं। गांधी जी मीम्स बनकर रह गए क्योंकि डिजिटल दुनिया में जटिलता सरलीकृत हो जाती है। लेकिन क्या हम उनकी फिलॉसफी को भी मीम्स की तरह भूल जाएंगे? शायद नहीं – क्योंकि बापू की तरह ही, मीम्स भी अमर हो जाते हैं।

(रिपोर्ट: unnatbharatlive.com न्यूज डेस्क)

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