X को झटका: कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, कहा- भारत के नियम मानने होंगे, अमेरिकी कानूनों का हवाला देकर नहीं बच सकते
X को झटका: कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, कहा- भारत के नियम मानने होंगे, अमेरिकी कानूनों का हवाला देकर नहीं बच सकते
बेंगलुरु: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व ट्विटर) को कर्नाटक हाईकोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने X की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कंपनी अमेरिका में अपने कानूनों का पालन करती है, लेकिन भारत में लागू टेकडाउन आदेशों को चुनौती देकर इनकार नहीं कर सकती। हर प्लेटफॉर्म जो भारत में काम करता है, उसे देश के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। यह फैसला X द्वारा दाखिल रिट पिटिशन [W.P.(C) 7405/2025] पर आया, जिसमें कंपनी ने केंद्र सरकार के कंटेंट ब्लॉकिंग ऑर्डरों को चुनौती दी थी।
कोर्ट की सिंगल बेंच ने 24 सितंबर 2025 को आदेश सुनाया, जिसमें X के तर्कों को “मेरिटलेस” करार दिया गया। जस्टिस विशाल गोग्ने ने कहा, “X अमेरिका में यूएस कानूनों का सम्मान करता है, लेकिन भारत में IT एक्ट की धारा 79(3)(b) के तहत जारी टेकडाउन नोटिसों को चुनौती देकर बचाव की कोशिश कर रहा है। यह स्वीकार्य नहीं।” केंद्र सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि X को यूजर कंटेंट हटाने के आदेशों को चुनौती देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। ऐसा करने पर प्लेटफॉर्म अपनी सेफ हार्बर इम्यूनिटी खो सकता है, जिसके तहत यूजर कंटेंट के लिए कंपनी जिम्मेदार नहीं मानी जाती।
यह मामला मार्च 2025 में शुरू हुआ था, जब X ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। कंपनी ने आरोप लगाया कि सरकार IT एक्ट की धारा 69A (वेबसाइट ब्लॉकिंग) के बजाय धारा 79(3)(b) का दुरुपयोग कर रही है, जो एक “समांतर सेंसरशिप प्रक्रिया” है। X ने दावा किया कि यह 2015 के श्रीय सिंगलल जजमेंट का उल्लंघन है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कंटेंट ब्लॉकिंग केवल कोर्ट ऑर्डर या धारा 69A के तहत ही हो सकती है। याचिका में गृह मंत्रालय के “सहयोग पोर्टल” को भी “अवैध सेंसरशिप टूल” बताया गया, जो MeitY के ऑफिस मेमोरेंडम 2023 के जरिए I4C को पावर देता है।
केंद्र ने जवाब में X पर पाखंड का आरोप लगाया। सरकार ने कहा कि X खुद यूजर्स या विक्टिम्स की शिकायत पर कंटेंट हटाती है (ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट्स के अनुसार), लेकिन सरकारी ऑर्डरों पर सवाल उठाती है। “राष्ट्रीय और सार्वजनिक हित में जारी ये ऑर्डर लिंचिंग और मॉब वायलेंस रोकने के लिए हैं,” सरकार की दलील थी। कोर्ट ने X की देरी को भी नोट किया – नोटिस मिलने के बावजूद कंपनी ने 1 साल से ज्यादा समय तक अनुपालन नहीं किया।
यह फैसला 2023 के एक पुराने केस की याद दिलाता है, जब कर्नाटक हाईकोर्ट ने X की याचिका खारिज कर 50 लाख का जुर्माना लगाया था। लेकिन 2025 का यह केस ज्यादा गहरा है, क्योंकि इसमें IT एक्ट की व्याख्या पर सवाल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह डिजिटल फ्रीडम और नेशनल सिक्योरिटी के बीच बैलेंस सेट करता है। X ने फैसले पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन सूत्रों के अनुसार अपील का विकल्प खुलेगा। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने इसे “सेंसरशिप का खतरा” बताया, जबकि सरकार ने इसे “कानून का राज” करार दिया।
यह मामला अन्य प्लेटफॉर्म्स के लिए भी सबक है – भारत जैसे बड़े मार्केट में लोकल नियमों का पालन जरूरी। क्या X सुप्रीम कोर्ट जाएगा? आने वाले दिनों में साफ होगा।
