महाराष्ट्र में नई वाहन नीति: सीएम, राज्यपाल और चीफ जस्टिस के लिए कोई मूल्य सीमा नहीं, अपनी पसंद की गाड़ी खरीद सकेंगे
महाराष्ट्र में नई वाहन नीति: सीएम, राज्यपाल और चीफ जस्टिस के लिए कोई मूल्य सीमा नहीं, अपनी पसंद की गाड़ी खरीद सकेंगे
महाराष्ट्र सरकार ने आधिकारिक वाहनों की खरीद के लिए नई नीति को मंजूरी दे दी है, जिसमें मुख्यमंत्री (सीएम), राज्यपाल, डिप्टी सीएम, हाईकोर्ट के जजों और लोकायुक्त को अपनी पसंद की कोई भी गाड़ी खरीदने की छूट दी गई है। इस नीति में इन पदों के लिए मूल्य सीमा पूरी तरह हटा दी गई है, जबकि अन्य मंत्रियों और अधिकारियों के लिए सीमित राशि निर्धारित की गई है। यह फैसला राज्य के वित्त विभाग द्वारा जारी सरकारी संकल्प (जीआर) के माध्यम से लिया गया है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भी आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति सरकारी खर्चों को बढ़ा सकती है, खासकर जब राज्य में कल्याणकारी योजनाओं के लिए फंड की कमी का रोना रोया जा रहा है।
नई नीति के तहत, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री, बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, अन्य हाईकोर्ट जज, डिप्टी लोकायुक्त और मुख्य सचिव के लिए वाहनों की खरीद पर कोई ऊपरी सीमा नहीं होगी। वे अपनी पसंद के अनुसार लग्जरी या कोई भी वाहन चुन सकेंगे, चाहे उसकी कीमत करोड़ों में हो। वर्तमान में, सीएम देवेंद्र फडणवीस और उनके दो डिप्टी सीएम पहले से ही करोड़ों रुपये कीमत वाली गाड़ियां इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके विपरीत, कैबिनेट मंत्रियों, मुख्य सचिव और सचिवों के लिए वाहन खरीद की सीमा 30 लाख रुपये तय की गई है, जो पहले की तुलना में 3 से 6 लाख रुपये की बढ़ोतरी है। एडवोकेट जनरल, मुख्य सूचना आयुक्त, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के चेयरमैन, राज्य निर्वाचन आयुक्त, राज्य मुख्य अधिकार सेवा आयुक्त और मंत्रालय के विभिन्न विभागों के सचिवों के लिए यह सीमा 25 लाख रुपये है।
सबसे बड़ी बढ़ोतरी जिला कलेक्टरों, मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ), पुलिस आयुक्तों, जिला पुलिस प्रमुखों, प्रधान जिला जजों, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और रजिस्ट्रारों के लिए हुई है। इनके लिए वाहन खरीद की सीमा अब 15 लाख रुपये हो गई है, जो पहले 9 लाख रुपये थी – यानी 6 लाख रुपये की वृद्धि। यह नीति ईवी को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष प्रावधान के साथ आई है, जिसमें ईवी खरीद पर 20% अतिरिक्त छूट दी गई है। उदाहरण के लिए, यदि कोई अधिकारी 30 लाख की सीमा में ईवी चुनता है, तो वह 36 लाख तक की गाड़ी खरीद सकता है। सरकार का कहना है कि यह कदम पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक वाहनों को अपनाने के लिए उठाया गया है।
यह नीति 2017 की पुरानी नीति का अपडेटेड वर्जन है, जब पहली बार सीएम, राज्यपाल आदि के लिए कोई सीमा हटाई गई थी। लेकिन अब बढ़ती महंगाई और ईवी ट्रेंड को ध्यान में रखते हुए सीमाओं में संशोधन किया गया है। महाराष्ट्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह नीति पदों की गरिमा और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए है। उच्च पदाधिकारियों को मजबूत और सुरक्षित वाहनों की जरूरत होती है।” हालांकि, विपक्ष ने इस फैसले पर तीखा विरोध जताया है। शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने कहा, “राज्य सरकार कल्याण योजनाओं को बंद करने का बहाना फंड की कमी बताती है, लेकिन सीएम और राज्यपाल के लिए असीमित खर्च की छूट दे रही है। यह जनता के पैसे का अपव्यय है। क्या करोड़ों की गाड़ियां खरीदना जरूरी है जब किसान और गरीब परेशान हैं?” कांग्रेस ने भी इसे ‘विलासिता की राजनीति’ करार दिया।
विपक्ष का तर्क है कि जब महाराष्ट्र जैसे राज्य में बाढ़, सूखा और आर्थिक चुनौतियां हैं, तब ऐसी नीति से जनता का विश्वास डगमगा सकता है। पूर्व में, 2023 में केरल सरकार पर भी हाईकोर्ट जजों के लिए करोड़ों की गाड़ियां खरीदने का आरोप लगा था। महाराष्ट्र में यह नीति लागू होने से सरकारी खर्च में वृद्धि हो सकती है, क्योंकि उच्च पदाधिकारियों द्वारा लग्जरी एसयूवी या बुलेटप्रूफ वाहनों की खरीद संभव हो गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये वाहन केवल आधिकारिक उपयोग के लिए होंगे, और पुराने वाहनों को स्क्रैप पॉलिसी के तहत नष्ट किया जाएगा। ईवी प्रोत्साहन से राज्य का कार्बन फुटप्रिंट कम करने में मदद मिलेगी।
यह फैसला महाराष्ट्र की राजनीति में नया विवाद पैदा कर सकता है, खासकर आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए। विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है, जबकि सत्ताधारी महायुति इसे आवश्यक सुधार बता रही है। कुल मिलाकर, यह नीति सरकारी वाहन खरीद प्रक्रिया को सरल बनाएगी, लेकिन खर्च नियंत्रण पर सवाल खड़े कर रही है।
