नेपाल में ‘Gen-Z Revolution’: सोशल मीडिया बैन के खिलाफ उबाल, 20 की मौत, 100 से अधिक घायल, PM ओली के इस्तीफे की मांग
नेपाल में ‘Gen-Z Revolution’: सोशल मीडिया बैन के खिलाफ उबाल, 20 की मौत, 100 से अधिक घायल, PM ओली के इस्तीफे की मांग
नेपाल में सरकार द्वारा 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जैसे फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, और एक्स पर प्रतिबंध लगाने के फैसले ने देशभर में तीव्र विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया है, जिसे ‘Gen-Z Revolution’ का नाम दिया गया है। सोमवार को काठमांडू और अन्य शहरों में हजारों युवाओं, खासकर जेन-जी समुदाय ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। इन प्रदर्शनों में हिंसक झड़पों में कम से कम 20 लोगों की मौत और 100 से अधिक लोग घायल हो गए। प्रदर्शनकारी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
विरोध प्रदर्शन का कारण
4 सितंबर को नेपाल सरकार ने मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप), अल्फाबेट (यूट्यूब), और एक्स जैसे 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पंजीकरण न करने के कारण ब्लॉक कर दिया। सरकार ने दावा किया कि यह कदम साइबर अपराध और गलत सूचना को रोकने के लिए उठाया गया। हालांकि, युवाओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला और सेंसरशिप करार दिया। प्रदर्शनकारी भ्रष्टाचार, जैसे 2017 के एयरबस डील घोटाले, और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को भी उठा रहे हैं, जो युवाओं में असंतोष का बड़ा कारण बने हैं।
हिंसक झड़प और कर्फ्यू
सोमवार सुबह 9 बजे (3:15 GMT) से शुरू हुए प्रदर्शन में हजारों युवा, जिनमें स्कूल-कॉलेज के छात्र भी शामिल थे, काठमांडू के मैतीघर मंडला से संसद भवन की ओर बढ़े। प्रदर्शनकारियों ने “भ्रष्टाचार बंद करो, सोशल मीडिया खोलो” और “युवा भ्रष्टाचार के खिलाफ” जैसे नारे लगाए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने संसद के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश कर लिया, जिसके बाद पुलिस ने आंसू गैस, रबर बुलेट, और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। स्थानीय मीडिया के अनुसार, पुलिस फायरिंग में 20 लोगों की मौत हो गई, और 100 से अधिक लोग घायल हुए। काठमांडू में दोपहर 12:30 बजे से रात 10 बजे तक कर्फ्यू लागू कर दिया गया, और सेना को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आवास के बाहर तैनात किया गया।
PM के इस्तीफे की मांग
प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जिन्हें वे भ्रष्टाचार और तानाशाही नीतियों का जिम्मेदार मानते हैं। ‘नेपो किड’ अभियान के तहत सोशल मीडिया पर नेताओं के बच्चों की विलासितापूर्ण जीवनशैली को भ्रष्टाचार से जोड़ा गया है, जिसने युवाओं के गुस्से को और भड़काया। श्रीलंका (2022) और बांग्लादेश (2024) में सरकारों के खिलाफ हुए आंदोलनों से प्रेरित होकर, प्रदर्शनकारी इसे जन-आंदोलन बनाने की कोशिश में हैं।
सरकार का रुख
प्रधानमंत्री ओली ने बैन का बचाव करते हुए कहा, “हम सोशल मीडिया के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विदेशी कंपनियों को नेपाल के कानूनों का पालन करना होगा।” उन्होंने प्रदर्शनकारियों को “विपक्ष के इशारे पर नाचने वाले” करार दिया। हालांकि, डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया। कंप्यूटर एसोसिएशन ऑफ नेपाल ने चेतावनी दी कि यह बैन शिक्षा, व्यवसाय और डिजिटल प्रगति को नुकसान पहुंचाएगा।
आगे की स्थिति
प्रदर्शन अब इटहारी, पोखरा, और नेपालगंज जैसे शहरों में फैल गए हैं। टिकटॉक और रेडिट जैसे वैकल्पिक प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवा संगठित हो रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन नेपाल की राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बन सकता है। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के हालिया बयान ने भी प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ाया है, जो हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग को भी उठा रहे हैं।
