राष्ट्रीय

सूरत कोर्ट का बड़ा फैसला: सहमति से बने शारीरिक संबंध के बाद शादी से इनकार को नहीं माना जाएगा रेप

सूरत कोर्ट का बड़ा फैसला: सहमति से बने शारीरिक संबंध के बाद शादी से इनकार को नहीं माना जाएगा रेप

सूरत, 28 अगस्त 2025: गुजरात के सूरत सेशन कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि दो पक्षों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं, तो बाद में शादी से इनकार करने को रेप का अपराध नहीं माना जाएगा। यह फैसला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (2) (न) के तहत एक मामले में सुनाया गया, जहां एक युवती ने अपने प्रेमी पर शादी का वादा कर धोखा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि सहमति जबरदस्ती या धोखे से नहीं ली गई थी, इसलिए इसे रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस फैसले ने न केवल कानूनी हलकों में चर्चा छेड़ दी है, बल्कि सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर भी बहस को जन्म दे दिया है।

मामला सूरत के एक 25 वर्षीय युवक के खिलाफ दर्ज था, जिसे पीड़िता ने धोखे से शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का दोषी ठहराया। पीड़िता का दावा था कि आरोपी ने शादी का वादा किया था, लेकिन बाद में इनकार कर दिया। पुलिस ने IPC की धारा 376 (2) (न) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत केस दर्ज किया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों के बयान, चैट्स और सबूतों की बारीकी से जांच की। जज ने फैसले में कहा, “सहमति का मतलब स्पष्ट और स्वैच्छिक होना चाहिए। यदि शादी का वादा टूट जाता है, तो यह सिविल मामला या ठगी हो सकता है, लेकिन आपराधिक रेप नहीं। रेप का अपराध तभी साबित होता है जब सहमति जबरन या धोखे से ली गई हो।” कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया और पीड़िता को सिविल कोर्ट में दावा दायर करने की सलाह दी।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 2019 के एक ऐतिहासिक फैसले से प्रेरित लगता है, जहां कहा गया था कि केवल शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाना रेप नहीं है, जब तक कि यह धोखा न हो। सुप्रीम कोर्ट ने अनुराधा शर्मा बनाम यूपी केस में स्पष्ट किया कि ‘झूठा वादा’ और ‘धोखा’ में अंतर है। झूठा वादा टूट सकता है, लेकिन धोखा अपराध है। सूरत कोर्ट ने इसी सिद्धांत को दोहराया, लेकिन इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि सहमति के बाद शादी से इनकार नैतिक रूप से गलत हो सकता है, लेकिन कानूनी रूप से रेप नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन सहमति की अवधारणा को मजबूत करता है।

कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले की सराहना की है। वकील डॉ. मीरा शर्मा ने कहा, “यह फैसला सहमति की महत्वपूर्णता पर जोर देता है। कई मामलों में शादी के वादे को रेप से जोड़ दिया जाता है, जो न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करता है। लेकिन हमें सावधान रहना होगा कि इससे महिलाओं का शोषण न हो।” दूसरी ओर, महिला अधिकार कार्यकर्ता नेहा कपूर ने चिंता जताई, “शादी का वादा अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को बंधन में डालने का हथियार बनता है। इस फैसले से ऐसे मामलों में न्याय मिलना मुश्किल हो सकता है।” गुजरात हाई कोर्ट के एक वकील ने बताया कि पिछले एक साल में सूरत में ऐसे 15 से ज्यादा केस आए, जिनमें से अधिकांश इसी तरह बरी हुए।

यह फैसला भारतीय समाज में प्रेम, विवाह और सहमति के मुद्दों पर नई बहस छेड़ेगा। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि युवाओं को रिश्तों में स्पष्ट संवाद रखना चाहिए और कानूनी जागरूकता बढ़ानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में ऐसे मामलों में दिशानिर्देश जारी किए हैं, जहां सहमति को साबित करने के लिए मजबूत सबूत जरूरी हैं। कुल मिलाकर, सूरत कोर्ट का यह फैसला कानूनी प्रणाली में संतुलन लाने की दिशा में एक कदम है, लेकिन सामाजिक जागरूकता की जरूरत बनी हुई है। यदि आप ऐसे किसी मामले में हैं, तो कानूनी सलाह लें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *