तमिलनाडु: इरोड के 10 गांवों ने 21वें साल भी पेश की मिसाल, वेलोड पक्षी अभयारण्य के कारण बिना पटाखों के मनाई दीपावली
तमिलनाडु: इरोड के 10 गांवों ने 21वें साल भी पेश की मिसाल, वेलोड पक्षी अभयारण्य के कारण बिना पटाखों के मनाई दीपावली
इरोड (तमिलनाडु):
पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण पेश करते हुए तमिलनाडु के इरोड जिले में ‘वेलोड पक्षी अभयारण्य’ (Vellode Birds Sanctuary) के आसपास स्थित 10 से अधिक गांवों के निवासियों ने रविवार को बिना पटाखे जलाए दीपावली मनाई। ग्रामीणों ने लगातार 21वें वर्ष अपनी इस गौरवशाली परंपरा को कायम रखते हुए सिद्ध किया है कि पारंपरिक उत्सव और प्रकृति संरक्षण एक साथ सहजता से चल सकते हैं।
पक्षियों को शोर और प्रदूषण से बचाने का सामूहिक संकल्प
ग्रामीणों ने पक्षियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए यह स्वेच्छा से फैसला लिया है:
संवेदनशील पहल: अभयारण्य में रहने वाले और दूर-दराज से आने वाले हजारों देशी-विदेशी पक्षियों को तेज शोर व वायु प्रदूषण से बचाने के लिए पटाखों से दूरी बनाई गई।
बच्चों का योगदान: बच्चों ने भी इस मुहिम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने तेज आवाज वाले पटाखों का त्याग कर केवल हल्की फुलझड़ियों से ही खुशी मनाई।
बाहर जाकर जलाए पटाखे: जिन परिवारों को पटाखे जलाने की इच्छा थी, उन्होंने गांव का माहौल शांत रखने के लिए अभयारण्य क्षेत्र से दूर अपने रिश्तेदारों के घर जाकर त्यौहार मनाया। निवासियों ने नए कपड़े पहनकर, मिठाइयां बांटकर और एक-दूसरे को बधाई देकर पारंपरिक तरीके से दीपावली का उत्सव मनाया।
240 एकड़ में फैला है वेलोड पक्षी अभयारण्य
इरोड शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित यह अभयारण्य क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है:
स्थापना और पहचान: केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा 1996 में स्थापित यह अभयारण्य लगभग 240 एकड़ में फैला हुआ है। यह तमिलनाडु के 16 आधिकारिक पक्षी अभयारण्यों में शामिल है।
पेरियाकुलम झील का महत्व: अन्य अभयारण्यों के विपरीत इसके आसपास कोई बड़ा जंगल नहीं है। इसका मुख्य पारिस्थितिक महत्व ‘पेरियाकुलम झील’ (टैंक) है, जो पक्षियों के लिए भोजन, घोंसला बनाने और प्रजनन का मुख्य आधार है।
प्रजातियों का ठिकाना: वेलोड अभयारण्य में बार-हेडेड गूज (पहाड़ी हंस), ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, यूरेशियन स्पूनबिल, स्पॉट-बिल्ड पेलिकन, वेस्टर्न मार्श हैरियर और ब्लू-टेल्ड बी-ईटर जैसी दुर्लभ और प्रवासी पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं।
21 वर्षों से बिना किसी सरकारी दबाव के जारी ग्रामीणों की यह सामुदायिक पहल दर्शाती है कि जनभागीदारी से वन्यजीवों का संरक्षण किस तरह संभव बनाया जा सकता है।

