नोटबंदी के 10 वर्ष पूरे होने पर कांग्रेस का केंद्र सरकार पर तीखा हमला, जयराम रमेश ने फैसले को बताया ‘विफल’
नोटबंदी के 10 वर्ष पूरे होने पर कांग्रेस का केंद्र सरकार पर तीखा हमला, जयराम रमेश ने फैसले को बताया ‘विफल’
नई दिल्ली:
देश में 8 नवंबर 2016 को लागू की गई नोटबंदी (Demonetisation) के आज 10 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस अवसर पर कांग्रेस पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इसे एक “तुग़लकी फरमान” करार दिया है। उन्होंने दावा किया कि यह फैसला अपने किसी भी प्राथमिक उद्देश्य को हासिल करने में पूरी तरह विफल रहा और इसने देश की अर्थव्यवस्था व करोड़ों लोगों की आजीविका को भारी नुकसान पहुंचाया है।
जयराम रमेश का केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अंग्रेजी दैनिक ‘द हिन्दू’ के इकोनॉमिक्स और बिजनेस एडिटर शरद राघवन के एक विस्तृत विश्लेषण को साझा करते हुए सरकार की नीतियों की आलोचना की:
उद्देश्यों में नाकामी: उन्होंने लिखा कि यह 8 नवंबर, 2016 की रात प्रधानमंत्री द्वारा घोषित किए गए फैसले का तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित शानदार विश्लेषण है, जो यह साबित करता है कि यह कदम अपने प्रमुख उद्देश्यों को हासिल करने में नाकाम रहा।
नकदी और जाली नोटों का मुद्दा: विश्लेषण के हवाले से यह सवाल उठाया गया है कि 2016 के बाद भी अर्थव्यवस्था में नकदी (कैश) का चलन और लोकप्रियता जस की तस बनी हुई है। इसके अलावा, नोटबंदी के बाद जारी किए गए नए 500 और 2000 रुपये के जाली नोटों के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई, और अंततः सरकार को 2000 रुपये के नोट को भी चलन से वापस लेना पड़ा जिससे आम जनता को दोबारा कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नोटबंदी को क्यों ठहराया गया था वैध?
नोटबंदी की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 2 जनवरी 2023 को 4:1 के बहुमत से सरकार के इस फैसले को वैध करार दिया था। अदालत के मुख्य आधार निम्नलिखित थे:
1. निर्णय लेने की प्रक्रिया (Due Process): अदालत ने माना कि फैसले की प्रक्रिया में कोई कानूनी खामी नहीं थी, क्योंकि सरकार ने आरबीआई केंद्रीय बोर्ड के साथ छह महीने तक विचार-विमर्श किया था।
2. आरबीआई अधिनियम की धारा 26(2): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार को इस धारा के तहत किसी भी मूल्यवर्ग के सभी सीरीज के नोटों को बंद करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
3. न्यायिक समीक्षा की सीमा: अदालत ने रेखांकित किया कि आर्थिक नीतियां कार्यपालिका के दायरे में आती हैं, और अदालत केवल प्रक्रिया की निष्पक्षता की समीक्षा कर सकती है, नीति के परिणामों की नहीं।
4. आनुपातिकता का सिद्धांत: पीठ ने माना कि जाली नोटों, काले धन और आतंकवाद के वित्तपोषण पर अंकुश लगाना एक वैध सरकारी उद्देश्य था, जिसके तहत यह कदम उठाया गया।
5. आमजन को राहत: अदालत ने माना कि पुराने नोट बदलने के लिए दिया गया 52 दिनों का समय अनुचित नहीं था।
(नोट: संविधान पीठ की सदस्य जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस फैसले से असहमति जताई थी और कहा था कि नोटबंदी का फैसला संसद के कानून के जरिए होना चाहिए था, न कि गजट अधिसूचना से। हालांकि, बहुमत का फैसला ही मान्य रहा।)

